
अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजना — कपिध्वज
Arjun ke Rath ki Dhwaja par Virajna - Kapidhwaj
रामेश्वरम् की उस भेंट के पश्चात हनुमान जी ने अर्जुन को अपना वचन दिया था कि महायुद्ध में वे उसके रथ की रक्षा करेंगे। समय आया — कुरुक्षेत्र की विशाल रणभूमि में कौरव और पाण्डव आमने-सामने खड़े हुए। अर्जुन का रथ, जिसके सारथी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे, समस्त सेनाओं के मध्य दिव्य तेज से देदीप्यमान था। उसी रथ के ऊपर लहराती ध्वजा पर हनुमान जी अपने विराट वानर-रूप में विराजमान हो गए। इसी कारण अर्जुन को "कपिध्वज" कहा गया — जिसकी ध्वजा पर कपि अर्थात् वानरराज हनुमान विराजते हों।
जब युद्ध आरम्भ हुआ और दोनों ओर से शंख गूँजे, तब हनुमान जी ने ध्वजा पर से ऐसा भयंकर सिंहनाद किया कि उसकी गर्जना पूरी रणभूमि में गूँज उठी। पाण्डव सेना का उत्साह द्विगुणित हो गया, जबकि कौरव योद्धाओं के हृदय भय से काँप उठे। कहते हैं, अर्जुन के शंख देवदत्त और भीम की हुँकार के साथ जब हनुमान जी की गर्जना मिलती, तो कौरव सेना के अनेक वीरों का मनोबल टूट जाता।
केवल गर्जना ही नहीं, हनुमान जी उस ध्वजा पर बैठे-बैठे अर्जुन के रथ की अदृश्य रक्षा भी करते रहे। भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों के छोड़े गए दिव्य अस्त्र और भयंकर बाण जब रथ की ओर आते, तो उनका विनाशकारी प्रभाव हनुमान जी की उपस्थिति-मात्र से क्षीण हो जाता। जिस रथ की रक्षा में स्वयं वायुपुत्र और सारथी श्रीकृष्ण हों, उस रथ को भला कौन-सा अस्त्र नष्ट कर सकता था!
एक बार अर्जुन को अपने रथ की दृढ़ता पर तनिक विस्मय हुआ — इतने प्रचंड अस्त्र सहकर भी उसका रथ अटल कैसे खड़ा है? श्रीकृष्ण ने मुसकराकर उन्हें ध्वजा की ओर देखने का संकेत किया। अर्जुन ने ऊपर दृष्टि उठाई तो देखा — हनुमान जी ध्वजा पर विराजमान होकर हर आते हुए अस्त्र को अपनी शक्ति से निष्फल कर रहे हैं। यह देखकर अर्जुन का हृदय कृतज्ञता से भर गया और उन्होंने समझ लिया कि इस विजय के पीछे कितनी दिव्य शक्तियाँ उनकी रक्षा में जुटी हैं।
अठारह दिनों तक हनुमान जी उसी ध्वजा पर अविचल विराजमान रहे। न थकान, न विश्राम — बस अपने वचन का पालन और अपने प्रभु श्रीकृष्ण की आज्ञा। उनका यह रूप भक्ति और कर्तव्य-पालन का अद्भुत आदर्श बन गया। जिस भक्त ने त्रेता में श्रीराम की सेवा की, वही भक्त द्वापर में श्रीकृष्ण की आज्ञा से अर्जुन की ध्वजा पर बैठकर धर्म की रक्षा में लीन रहा।
इसी कारण भगवद्गीता के आरम्भ में भी अर्जुन को "कपिध्वज" कहकर संबोधित किया गया है — यह नाम केवल एक चिह्न नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि जहाँ धर्म है, जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ हनुमान जी की रक्षक शक्ति स्वयं उपस्थित रहती है।
इस कथा का भाव यही है — जहाँ प्रभु की भक्ति और हनुमान जी का आश्रय है, वहाँ बड़े से बड़ा संकट भी भक्त को छू नहीं सकता; विजय सदा धर्म और समर्पण के पक्ष में ही होती है।