Bhim se Bhent - Poonch Na Utha Pana aur Abhiman Bhang

भीम से भेंट — पूँछ न उठा पाना और अभिमान भंग

Bhim se Bhent - Poonch Na Utha Pana aur Abhiman Bhang

पाण्डवों के वनवास काल की बात है। द्रौपदी ने गंधमादन पर्वत की सुगंधित हवा में उड़कर आया एक अद्भुत सहस्रदल कमल देखा। उसकी दिव्य सुगंध से मुग्ध होकर उन्होंने भीम से वैसे ही और कमल लाने का आग्रह किया। अपनी प्रिया द्रौपदी का मन रखने के लिए महाबली भीम गदा उठाकर पर्वत के दुर्गम मार्ग पर चल पड़े। वे बड़े गर्व से भरे हुए थे — अपने बाहुबल पर, अपनी शक्ति पर, अपनी अजेयता पर। मार्ग में जो भी वृक्ष या शिला आती, वे उसे उखाड़ फेंकते और सिंहनाद करते हुए आगे बढ़ते जाते।

चलते-चलते वे एक सँकरी पगडंडी पर पहुँचे। वहाँ मार्ग के ठीक बीचोबीच एक वृद्ध वानर पड़ा हुआ था। उसकी लम्बी पूँछ पूरे रास्ते पर फैली हुई थी। भीम गरजकर बोले — "अरे वानर! मार्ग से हट जा। मैं पाण्डुपुत्र भीम हूँ, वायुपुत्र। मेरे मार्ग में जो भी आता है, उसका अंत निश्चित है।" वृद्ध वानर ने आँखें खोलकर मंद स्वर में कहा — "पुत्र, मैं वृद्ध और रोगी हूँ, उठने की शक्ति नहीं। तुम मेरी पूँछ ही हटाकर आगे निकल जाओ।"

भीम को यह बात हास्यास्पद लगी। जिन बाहुओं ने हिडिम्ब और बकासुर जैसे राक्षसों का संहार किया, उनके लिए एक वानर की पूँछ हटाना क्या कठिन था! उन्होंने तिरस्कारपूर्वक अपने बाएँ हाथ से पूँछ उठानी चाही — किन्तु वह टस से मस न हुई। भीम चौंके। अब उन्होंने दोनों हाथों से पूरी शक्ति लगाई, माथे पर पसीने की धाराएँ बह निकलीं, शरीर की एक-एक नस तन गई — पर वह पूँछ मानो पर्वत की जड़ हो, अपने स्थान से एक तिनके भर भी न हिली।

तब भीम का समस्त अभिमान चूर-चूर हो गया। उनका मस्तक झुक गया। उन्होंने विनम्र होकर हाथ जोड़ लिए और पूछा — "हे वानरश्रेष्ठ! आप साधारण वानर नहीं हो सकते। मुझे क्षमा करें, मैं अपनी शक्ति के मद में अंधा हो गया था। कृपया अपना वास्तविक स्वरूप बताएँ।" तब उस वृद्ध वानर ने अपने भीतर छिपे महातेज को प्रकट किया — वे स्वयं श्री हनुमान जी थे, भीम के ही धर्म-भाई, क्योंकि दोनों ही पवनदेव के पुत्र थे।

हनुमान जी ने स्नेह से भीम को गले लगाया और कहा — "पुत्र, तुम भी वायुपुत्र हो और मैं भी। तुम्हारी रक्षा के लिए ही मैं यहाँ बैठा था, क्योंकि आगे का मार्ग यक्षों और राक्षसों से भरा है।" भीम ने आँसू भरी आँखों से प्रार्थना की कि वे अपना वही विराट रूप दिखाएँ जो उन्होंने समुद्र लाँघते समय धरा था। हनुमान जी ने अपना शरीर बढ़ाना आरम्भ किया, और देखते ही देखते वह इतना विशाल हो गया कि पूरा गंधमादन पर्वत छोटा प्रतीत होने लगा। भीम उस दिव्य दर्शन से नतमस्तक हो गए।

जाते-जाते हनुमान जी ने वचन दिया — "पुत्र, जब महायुद्ध होगा, तब मैं अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान होकर तुम सबकी रक्षा करूँगा। जब तुम रणभूमि में सिंहनाद करोगे, मैं भी अपनी गर्जना उसमें मिला दूँगा, जिससे शत्रुओं के हृदय काँप उठेंगे।" भीम कृतार्थ हो गए। जो शक्ति के अहंकार में डूबे थे, वे भक्ति और विनम्रता के अमृत से भर उठे।

इस कथा का भाव यही है — सच्चा बल वही है जो विनम्रता के साथ हो; जहाँ अभिमान आता है, वहाँ प्रभु स्वयं उसे भंग कर भक्त को सन्मार्ग दिखाते हैं।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Arjun ka Abhiman Bhang - Setu aur Poonch wali Katha

अर्जुन का अभिमान भंग — सेतु और पूँछ वाली कथा

Hanuman Mahabharat Kaal
Arjun ke Rath ki Dhwaja par Virajna - Kapidhwaj

अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजना — कपिध्वज

Hanuman Mahabharat Kaal
Yuddh ke Baad Dhwaja se Utarte Hi Rath ka Bhasm Hona

युद्ध के बाद ध्वजा से उतरते ही रथ का भस्म होना

Hanuman Mahabharat Kaal