
अर्जुन का अभिमान भंग — सेतु और पूँछ वाली कथा
Arjun ka Abhiman Bhang - Setu aur Poonch wali Katha
महाभारत युद्ध से पूर्व की बात है। तीर्थयात्रा करते हुए अर्जुन दक्षिण दिशा में रामेश्वरम् पहुँचे, जहाँ श्रीराम ने समुद्र पर पत्थरों का सेतु बाँधकर लंका तक सेना पार कराई थी। उस विशाल सेतु को देखकर धनुर्धर अर्जुन के मन में एक अभिमान जाग उठा। वे सोचने लगे — "श्रीराम तो महान बाणावली धनुर्धर थे; उन्होंने बाणों का सेतु क्यों नहीं बनाया? पत्थरों पर वानरों को क्यों दौड़ाया? मैं तो अपने बाणों से ही ऐसा दृढ़ पुल बना सकता हूँ जिस पर सारी सेना पार हो जाए।"
तभी वहाँ एक वृद्ध वानर प्रकट हुआ। वह मुसकराकर बोला — "हे धनुर्धर! तुम्हारे बाणों का पुल भला एक वानर का भार भी सह सकेगा क्या? श्रीराम की सेना के वानर तो बड़े भारी और बलवान थे।" अर्जुन को यह चुनौती भाई नहीं। उन्होंने प्रतिज्ञा की — "यदि मेरा बाण-सेतु तुम्हारे एक स्पर्श से टूट जाए, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दूँगा।" वानर ने भी वचन दिया — "और यदि सेतु न टूटा, तो मैं आजीवन तुम्हारी सेवा करूँगा।"
अर्जुन ने मंत्र पढ़कर अपनी अद्भुत धनुर्विद्या से जल पर बाणों का एक सुदृढ़ सेतु रच दिया, जो देखने में अत्यंत सुन्दर और मजबूत जान पड़ता था। परन्तु जैसे ही उस छोटे-से वानर ने अपना एक पाँव उस पर रखा और तनिक-सा भार डाला, समस्त बाण चटचटाकर टूट गए और पूरा सेतु जल में बिखर गया। अर्जुन स्तब्ध रह गए। फिर उन्होंने और भी अधिक दृढ़ता से दूसरा, तीसरा सेतु बनाया, पर वह वानर हर बार सहज ही उसे तोड़ देता।
अब अर्जुन का सारा दर्प टूट चुका था। प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने चिता सजाई और अग्नि में प्रवेश करने चले। तभी वहाँ एक ब्राह्मण बालक प्रकट हुआ और बोला — "रुको! यह प्रतियोगिता तो बिना किसी साक्षी के हुई थी; बिना निर्णायक के कोई निर्णय मान्य नहीं। फिर एक बार सेतु बनाओ, मैं साक्षी रहूँगा।" वह बालक और कोई नहीं, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे। इस बार जब अर्जुन ने सेतु बनाया और वानर ने उस पर भार डाला, तो सेतु अटल खड़ा रहा।
क्रोध में वानर ने पूरी शक्ति लगाई, अपना विराट रूप धरकर उस पर कूदने लगा, फिर भी सेतु न टूटा। तब उस वानर ने अपने सूक्ष्म दृष्टि से देखा — सेतु के हर बाण को भगवान श्रीकृष्ण अपने कोमल हाथों से नीचे से थामे हुए थे, और उनकी पीठ से रक्त बह रहा था। यह देखकर हनुमान जी — क्योंकि वह वानर स्वयं हनुमान जी ही थे — विह्वल होकर श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने पहचान लिया कि यह तो साक्षात् उनके प्रभु श्रीराम ही कृष्ण-रूप में विराजमान हैं।
श्रीकृष्ण ने प्रेम से हनुमान जी को उठाया और कहा — "पवनपुत्र, अब तुम अर्जुन की सेवा करने का अपना वचन निभाओ। इस महायुद्ध में तुम इसके रथ की ध्वजा पर विराजमान रहना और इसकी रक्षा करना।" अर्जुन का सारा अभिमान जल की तरह बह गया; वे विनम्र होकर दोनों — प्रभु और हनुमान जी — के चरणों में नतमस्तक हो गए।
इस कथा का भाव यही है — कोई कितना भी बड़ा साधक क्यों न हो, अभिमान आते ही उसका पतन निश्चित है; भक्त का सच्चा बल उसकी विनम्रता और प्रभु के प्रति समर्पण में ही है।