
यादव कुल का संहार — ऋषियों का श्राप और मूसल
Yadav Kul Ka Sanhaar - Rishiyon Ka Shraap Aur Moosal
महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। धर्म की स्थापना हो गई थी, अधर्म का भार पृथ्वी से उतर चुका था, और अब वह समय निकट आ रहा था जब भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला समेटकर अपने नित्य धाम को लौटने वाले थे। द्वारका उस समय समस्त वैभव और आनंद से परिपूर्ण नगरी थी, जहाँ यादव वंश के वीर उद्धत होकर सुख-भोग में डूबे रहते थे। जिस कुल को स्वयं भगवान ने अपना आश्रय बनाया था, उसी कुल का अंत अब एक अद्भुत लीला के रूप में प्रकट होने वाला था।
एक दिन विश्वामित्र, कण्व और नारद आदि महान ऋषि द्वारका आए। यादव कुल के कुछ अभिमानी युवक अपने बल और सौभाग्य के मद में चूर होकर उन ऋषियों के साथ हँसी-ठिठोली करने लगे। उन्होंने साम्ब नामक युवक को स्त्री का वेश पहनाया और गर्भवती स्त्री बनाकर ऋषियों के सामने ले गए। फिर उपहासपूर्वक पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से पुत्र होगा या पुत्री। ऋषियों को इस अपमानजनक परिहास से बड़ी वेदना हुई।
ब्रह्मज्ञानी ऋषि क्रोधित होकर बोले — "यह साम्ब न पुत्र जनेगा न पुत्री, अपितु इसके गर्भ से एक लोहे का मूसल उत्पन्न होगा, और वही मूसल तुम्हारे समस्त यादव कुल के विनाश का कारण बनेगा।" यह वचन कहकर ऋषि चले गए। भयभीत युवक जब यह समाचार लेकर राजा उग्रसेन के पास पहुँचे, तब कुछ ही समय में सचमुच साम्ब के उदर से एक भयंकर लोहे का मूसल प्रकट हो गया। सब स्तब्ध रह गए।
राजा उग्रसेन ने आज्ञा दी कि उस मूसल को घिसकर उसका चूर्ण बना दिया जाए और समुद्र में फेंक दिया जाए। यादवों ने वैसा ही किया। किन्तु जो प्रारब्ध विधि के विधान से लिखा हो, उसे कौन टाल सकता है? समुद्र की लहरें उस लोहे के चूर्ण को किनारे पर बहा लाईं, और वहाँ की भूमि पर वह चूर्ण एरका नामक तीखी और तीक्ष्ण घास के रूप में उग आया। मूसल का जो अंतिम टुकड़ा शेष रह गया था, उसे एक मछली निगल गई, जो आगे चलकर जरा नामक व्याध के हाथ लगने वाली थी।
इसी बीच द्वारका में अनेक अपशकुन प्रकट होने लगे। भयंकर आँधियाँ चलतीं, दिशाएँ धूमिल हो जातीं, चूहे बढ़ गए, गृह-देवताओं की मूर्तियाँ स्वयं हिलती-काँपती दिखतीं, और रात्रि में अशुभ स्वर सुनाई देते। भगवान श्रीकृष्ण इन सब लक्षणों को देखकर समझ गए कि अब कुल के संहार का और उनके स्वधाम गमन का समय समीप आ गया है। वे शांत, प्रसन्न और अपनी लीला के प्रति पूर्ण जागरूक थे।
भगवान ने स्वयं यादवों को आज्ञा दी कि वे समुद्र-तट पर स्थित पवित्र प्रभास क्षेत्र की तीर्थयात्रा पर चलें, जहाँ देव, पितर और तीर्थों का पूजन कर वे पापों से मुक्त हों। यह भी भगवान की लीला का ही एक अंग था, क्योंकि जो घटना घटने वाली थी, उसके लिए यही उपयुक्त स्थान और समय था। इस प्रकार ऋषियों का श्राप और वह लोहे का मूसल यादव कुल के संहार की भूमिका बन गए।
इस लीला का भाव यही है कि अभिमान और अपने बल का मद, चाहे वह भगवान के आश्रित कुल में ही क्यों न हो, विनाश का कारण बनता है — और भगवान की समस्त लीलाएँ अंततः धर्म और भक्ति की ओर ही ले जाती हैं।