Balram Ka Deh Tyaag

बलराम का देह त्याग

Balram Ka Deh Tyaag

प्रभास क्षेत्र में यादवों का वह अंतिम समागम हुआ। ऋषियों के श्राप के अनुसार, वहाँ मदिरा-पान से उन्मत्त होकर यादव वीर आपस में ही विवाद करने लगे। पुराने बैर, तीखे वचन और अहंकार भड़क उठे। फिर वे समुद्र-तट पर उगी उसी एरका घास को उखाड़ने लगे, और वह घास उनके हाथ में आते ही लोहे के मूसल के समान कठोर अस्त्र बन गई। उसी घास से वे एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे और देखते-ही-देखते समस्त यादव कुल का संहार हो गया।

इस समस्त लीला के मध्य भगवान श्रीकृष्ण और उनके अग्रज बलराम शांत भाव से विराजमान थे। जो होना था, वह प्रारब्ध और भगवान की इच्छा से हो रहा था, अतः वे किसी को रोकने का प्रयास नहीं कर रहे थे। कुल का संहार पूर्ण होने पर भगवान बलराम, जो शेषनाग के अवतार हैं, ने समझ लिया कि अब उनके भी इस लोक से प्रयाण का समय आ गया है।

बलराम जी समुद्र-तट पर एकांत में जाकर बैठ गए। उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियों और मन को अपने भीतर एकाग्र किया और योग की गहन समाधि में स्थित हो गए। सम्पूर्ण जगत् के आधारभूत, अनन्त शेष के रूप में विराजने वाले बलराम जी ने अपने योगबल से अपने भीतर की चेतना को परमात्मा में लीन कर दिया। यह कोई साधारण मृत्यु नहीं थी, अपितु एक महायोगी का स्वेच्छा से किया गया दिव्य देह-त्याग था।

पुरातन कथा के अनुसार, जैसे ही बलराम जी ने अपने शरीर का त्याग किया, उनके मुख से एक श्वेत, विशाल और तेजस्वी सर्प निकला। वही अनन्त शेषनाग थे, जो बलराम के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। अनेक नागराज और साक्षात् समुद्र-देव उनके स्वागत के लिए वहाँ उपस्थित हुए, और वह दिव्य सर्प स्वरूप ससम्मान अपने नित्य लोक की ओर प्रस्थान कर गया।

बलराम जी का यह देह-त्याग शोक का नहीं, अपितु परम गौरव और दिव्यता का विषय है। जिसने बचपन से भगवान श्रीकृष्ण की हर लीला में सहभागी बनकर, धर्म और भ्रातृ-प्रेम की अनुपम मर्यादा स्थापित की, वही महाबली अपने स्वरूप में लौट रहा था। उनका जाना संकेत था कि अब भगवान श्रीकृष्ण की भी अवतार-लीला अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी है।

इस लीला का भाव यही है कि जो भगवान का अनन्य आश्रय और सहचर है, वह मृत्यु को भी योग की समाधि बना लेता है — और महापुरुषों का जाना अंत नहीं, अपने मूल स्वरूप में सहज लौटना है।

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