
द्वारका का समुद्र में समाना
Dwarka Ka Samudra Mein Samaana
भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन और यादव कुल के संहार का समाचार जब हस्तिनापुर पहुँचा, तब समस्त पाण्डव और द्वारकावासी शोक से व्याकुल हो उठे। भगवान का सारथि दारुक तत्काल हस्तिनापुर पहुँचा और उसने अर्जुन को समस्त घटनाओं का वृत्तांत सुनाया। भगवान के परम सखा अर्जुन तुरंत द्वारका की ओर चल पड़े, जहाँ अब केवल स्त्रियाँ, वृद्ध और बालक ही शेष रह गए थे।
द्वारका पहुँचकर अर्जुन ने वृद्ध राजा वसुदेव को शांत किया, जो पुत्र-वियोग में देह त्याग कर चुके थे। अर्जुन ने वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण और अन्य यादवों का विधिपूर्वक अंत्येष्टि-संस्कार सम्पन्न कराया। तत्पश्चात् उन्होंने द्वारका की समस्त शेष प्रजा — स्त्रियों, बालकों और वृद्धों को साथ लेकर उस सुवर्ण-नगरी को छोड़ इन्द्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान करने का निश्चय किया, क्योंकि भगवान स्वयं यह संकेत दे चुके थे कि उनके जाते ही यह नगरी नहीं रहेगी।
जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमलों से पवित्र हुई वह द्वारकापुरी उनके अधिष्ठान से रहित हुई, वैसे ही समुद्र-देव अपनी मर्यादा से आगे बढ़ आए। भगवान ने कभी समुद्र से ही यह भूमि लेकर द्वारका बसाई थी; अब भगवान के जाते ही समुद्र ने अपनी वह भूमि पुनः अपने भीतर समेट ली। एक-एक करके नगरी के भवन, प्रासाद और स्वर्णिम राजमार्ग जल में समाते चले गए।
अर्जुन जब प्रजा को साथ लेकर नगरी से बाहर निकल रहे थे, तब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा — जिस स्थान पर कभी भगवान का दिव्य महल और सुदर्शन-रक्षित नगरी शोभायमान थी, वहाँ अब केवल अथाह समुद्र लहरा रहा था। केवल वह भवन शेष बचा, जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण निवास करते थे — शेष सम्पूर्ण द्वारका सागर की गोद में विलीन हो गई थी। यह दृश्य भगवान की उस लीला का साक्षी था कि जो कुछ उनके निमित्त बना, वह उनके जाते ही अपने मूल में लौट गया।
भारी हृदय से अर्जुन उस विशाल जनसमूह को लेकर आगे बढ़े। मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ आईं, किन्तु अंततः उन्होंने भगवान की शेष प्रजा को सुरक्षित पहुँचा दिया और वंश की रक्षा की। इस प्रकार वह द्वारका, जो भगवान की सांसारिक लीलाओं की केंद्र-भूमि थी, अपनी पूर्णता को प्राप्त कर पवित्र समुद्र में सदा के लिए समा गई।
इस लीला का भाव यही है कि इस संसार में सब कुछ नश्वर और परिवर्तनशील है — केवल भगवान का नाम, स्वरूप और भक्ति ही शाश्वत है; जहाँ प्रभु का अधिष्ठान है, वहीं सच्चा वैभव है, और उनके बिना संसार की समस्त शोभा जल की भाँति बह जाती है।