
जरा नामक व्याध का बाण और कृष्ण का स्वधाम गमन
Jara Naamak Vyaadh Ka Baan Aur Krishna Ka Swadhaam Gaman
बलराम जी के देह-त्याग के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण उस पवित्र प्रभास क्षेत्र में अकेले रह गए। समस्त लीला अब पूर्णता की ओर थी। भगवान समुद्र के निकट एक पीपल वृक्ष के नीचे शांतभाव से भूमि पर विश्राम करने बैठ गए। उन्होंने अपना बायाँ चरण दायीं जंघा पर रख लिया और अर्धनिमीलित नेत्रों से ध्यानमग्न होकर परम शांति में स्थित हो गए। उनके मुख पर वही अलौकिक मुस्कान थी, जो सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करती है।
उसी समय जरा नामक एक व्याध, जो उस वन में शिकार की खोज में घूम रहा था, वहाँ आ पहुँचा। यह वही व्याध था जिसे उस मछली के उदर से प्राप्त मूसल के अंतिम टुकड़े से बना तीक्ष्ण बाणाग्र मिला था। दूर से उसने वृक्ष के नीचे भगवान के लाल-कमल समान तलवे की झलक देखी, और उसे भ्रम हुआ कि यह किसी मृग का मुख है। शिकार समझकर उसने अपना धनुष चढ़ाया और वह बाण छोड़ दिया।
वह बाण सीधे भगवान श्रीकृष्ण के चरण-तल में जा लगा। समीप आकर जब व्याध ने देखा कि उसने किसी पशु को नहीं, अपितु चतुर्भुज, पीताम्बरधारी, दिव्य पुरुष को बाण मारा है, तो वह भय और पश्चात्ताप से थर-थर काँप उठा। वह भगवान के चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए क्षमा माँगने लगा — "हे प्रभु! मुझ अज्ञानी से यह घोर अपराध हो गया, मुझे क्षमा कर दीजिए।"
करुणासागर भगवान ने उसे शांत करते हुए कहा — "हे जरा! तुम भयभीत मत हो। तुमने कोई अपराध नहीं किया। यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है। पूर्वकाल में तुम त्रेतायुग में बालि थे, और मैंने राम-रूप में तुम्हें छिपकर बाण मारा था; आज उसी लीला की पूर्णता हुई है।" यह अभयवचन सुनकर व्याध कृतार्थ हो गया, और भगवान की आज्ञा पाकर वह दिव्य विमान से स्वर्ग को चला गया।
तत्पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण, जो स्वयं समस्त लोकों के अधीश्वर हैं, ने अपनी लीला-देह में स्थित रहते हुए अपने नित्य, अप्राकृत, चिन्मय स्वरूप की ओर प्रस्थान किया। उस समय आकाश में दिव्य ज्योति प्रकट हुई, देवता पुष्पवर्षा करने लगे, दुंदुभियाँ बजने लगीं, और सम्पूर्ण दिशाएँ भगवान के तेज से आलोकित हो उठीं। भगवान ने अपने सम्पूर्ण दिव्य धाम — गोलोक की ओर स्वधाम गमन किया।
यह घटना शोक का विषय नहीं है, क्योंकि भगवान की देह कभी नाशवान नहीं होती; यह तो केवल उनकी लीला-लीला का मंगलमय समापन था, जिसमें उन्होंने एक साधारण व्याध को भी क्षमा और मुक्ति प्रदान की।
इस लीला का भाव यही है कि भगवान अपने भक्तों और अपने द्वारा किए किसी को भी अपराधी नहीं मानते, अपितु प्रत्येक जीव पर करुणा बरसाते हुए उसे अपने धाम की ओर उठा लेते हैं।