
सीता का सिंदूर और हनुमान का पूरे शरीर पर सिंदूर लगाना
Sita Ka Sindoor Aur Hanuman
अयोध्या में सुखपूर्वक राज्य चल रहा था। एक प्रातः हनुमान जी माता सीता के दर्शन के लिए उनके कक्ष में पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि माता सीता अपनी माँग में सिंदूर सजा रही हैं। पवनपुत्र के मन में सहज ही जिज्ञासा उठी। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से पूछा, "माता, आप यह लाल रंग का सिंदूर अपने मस्तक पर क्यों सजाती हैं? इससे आपको क्या प्राप्त होता है?"
माता सीता मंद-मंद मुस्कुराईं और स्नेह से बोलीं, "हे हनुमान! एक सुहागिन स्त्री अपनी माँग में सिंदूर इसलिए सजाती है ताकि उसके स्वामी की आयु दीर्घ हो, वे सदा प्रसन्न और स्वस्थ रहें। यह सिंदूर मेरे प्रभु श्रीराम के प्रति मेरे प्रेम और मंगल-कामना का प्रतीक है।" यह उत्तर सुनकर हनुमान जी के हृदय में एक अनोखा भाव जागा। उन्होंने सोचा — जब माता की एक चुटकी सिंदूर से प्रभु की आयु और मंगल बढ़ता है, तब यदि मैं अपने सारे शरीर पर सिंदूर लगा लूँ, तो मेरे प्रभु श्रीराम अजर-अमर हो जाएँगे, उनका जीवन असीम मंगल से भर जाएगा।
इस विचार से भरकर हनुमान जी सीधे बाजार गए और ढेर सारा सिंदूर ले आए। फिर उन्होंने अपने पूरे विशाल शरीर पर, सिर से लेकर पैर तक, वह सिंदूर पोत लिया। उनका सारा अंग सिंदूरी लाल हो उठा। इसी सिंदूर से सजी-धजी अवस्था में जब वे राजसभा में पहुँचे, तो सबकी दृष्टि उन पर टिक गई। श्रीराम भी यह अद्भुत रूप देखकर चकित रह गए और मुस्कुराते हुए बोले, "हनुमान, यह क्या? तुमने अपने सारे शरीर को सिंदूर से क्यों रँग लिया?"
हनुमान जी ने हाथ जोड़कर सरल भाव से उत्तर दिया, "प्रभु! जब माता सीता की एक चुटकी सिंदूर आपकी आयु और मंगल बढ़ाती है, तो मैंने सोचा कि यदि मैं अपने सारे शरीर पर सिंदूर लगा लूँ, तो आपका जीवन और भी अधिक दीर्घ और मंगलमय हो जाएगा। मेरे लिए तो आपके सुख से बढ़कर कुछ भी नहीं।" यह भोला किन्तु अगाध प्रेम सुनकर श्रीराम की आँखें भर आईं। सारी सभा हनुमान जी की इस निश्छल भक्ति पर मुग्ध हो गई।
श्रीराम ने अत्यंत प्रसन्न होकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया कि जो भी भक्त उन्हें सिंदूर और चोला अर्पित करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी और उस पर हनुमान जी की विशेष कृपा बरसेगी। यही कारण है कि आज भी हनुमान जी की मूर्तियों पर सिंदूर और चमेली के तेल का चोला चढ़ाया जाता है, और मंगलवार तथा शनिवार को यह परंपरा विशेष रूप से निभाई जाती है।
इस कथा का भाव यही है — सच्ची भक्ति में तर्क नहीं, केवल प्रेम होता है; हनुमान जी का सिंदूरी रूप हमें सिखाता है कि प्रभु के मंगल के लिए भक्त अपना सर्वस्व अर्पण करने को सहर्ष तैयार रहता है।