
राम नाम की महिमा और तुलसी पत्र वाली तुला-कथा
Ram Naam Ki Mahima Aur Tulsi Patra
एक बार अयोध्या के दरबार में देवर्षि नारद पधारे। हनुमान जी की अखंड राम-भक्ति और उनके सरल स्वभाव को नारद जी भली-भाँति जानते थे। उनके मन में एक भाव उठा कि क्यों न ऐसा प्रसंग रचा जाए जिससे संसार को राम-नाम की अपार महिमा और हनुमान जी की भक्ति की गहराई का बोध हो जाए। इसी उद्देश्य से उन्होंने एक लीला की भूमिका बनाई।
माता सीता ने एक दिन प्रेमपूर्वक निश्चय किया कि वे श्रीराम को स्वर्ण, रत्न और आभूषणों से तौलेंगी और वह सारा धन दान कर देंगी, जिससे प्रभु का यश और मंगल बढ़े। दरबार में एक विशाल तुला (तराजू) लगाई गई। एक पलड़े में स्वयं श्रीराम विराजमान हुए और दूसरे पलड़े में स्वर्ण-मुद्राएँ, हीरे-मोती और बहुमूल्य आभूषण रखे जाने लगे। किन्तु आश्चर्य! जितना भी धन डाला जाता, प्रभु वाला पलड़ा भारी ही रहता, और धन वाला पलड़ा तनिक भी नीचे न झुकता। सारा राजकोष उँडेल दिया गया, फिर भी तुला संतुलित न हुई। सभी हैरान रह गए।
तभी हनुमान जी वहाँ पहुँचे। उन्होंने सारी स्थिति देखी और मंद मुस्कान के साथ आगे बढ़े। उन्होंने कहा कि इस असीम प्रभु को भला भौतिक धन से कैसे तौला जा सकता है? इन्हें तो केवल भक्ति और इनके नाम से ही तौला जा सकता है। यह कहकर उन्होंने एक छोटा-सा तुलसी का पत्र उठाया, उस पर श्रद्धा से "राम" नाम लिखा — या कुछ कथाओं के अनुसार राम-नाम का स्मरण करते हुए उसे प्रभु के चरणों में समर्पित किया — और उस पवित्र तुलसी-दल को धन वाले पलड़े में रख दिया।
उस एक तुलसी-पत्र के रखते ही, जिस पर राम-नाम अंकित था, चमत्कार हो गया। धन का पलड़ा तत्काल नीचे झुक गया और श्रीराम वाला पलड़ा ऊपर उठ गया। सारे स्वर्ण-रत्न मिलकर भी जो न कर सके, वह एक तुलसी-पत्र और राम-नाम ने कर दिखाया। पूरी सभा स्तब्ध रह गई और सबके मुख से "जय राम, जय हनुमान" के उद्घोष गूँज उठे। नारद जी की लीला सफल हुई — संसार ने जान लिया कि राम-नाम स्वयं राम से भी बढ़कर महिमामय है।
हनुमान जी ने विनम्रता से समझाया कि प्रभु के प्रति सच्चा प्रेम और उनका पावन नाम ही सबसे बड़ा धन है। जो भक्त श्रद्धा से एक तुलसी-दल भी अर्पित कर दे, वह करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओं के दान से भी अधिक फल पाता है, क्योंकि भगवान भाव के भूखे हैं, धन के नहीं।
इस कथा का भाव यही है — भगवान को न धन तौल सकता है, न वैभव; उन्हें तो केवल शुद्ध भक्ति और उनका पावन नाम ही तौलता है, और हनुमान जी ने राम-नाम की यही अनंत महिमा जगत को दिखाई।