
सीना चीरकर राम-सीता के दर्शन
Seena Cheerkar Ram-Sita Ke Darshan
राजतिलक की उस सभा में जब हनुमान जी ने मोतियों की माला के हर मोती को परखकर कहा कि उनमें उन्हें राम-सीता का दर्शन नहीं हुआ, तो कुछ सभासद उनका उपहास करने लगे। उनमें से किसी ने तीखे स्वर में कहा, "हे कपिश्रेष्ठ! यदि उस मूल्यवान माला में राम नहीं हैं, तो क्या तुम्हारे इस पशु-शरीर में राम विराजमान हैं? यह तो हास्यास्पद बात है।" यह ताना हनुमान जी के हृदय में उतर गया, पर उन्होंने क्रोध नहीं किया — उनके भीतर तो केवल राम-प्रेम का सागर लहरा रहा था।
हनुमान जी ने शांत भाव से उत्तर दिया, "हे सभासदो! मेरे इस शरीर का एक-एक रोम, एक-एक कण केवल श्रीराम के लिए ही है। मेरे भीतर राम के अतिरिक्त और कुछ नहीं। यदि तुम्हें विश्वास न हो, तो स्वयं देख लो।" यह कहकर, सभा के समक्ष, अपने प्रभु के प्रति अटूट प्रेम के साथ, उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपना विशाल वक्षस्थल चीर दिया।
उस क्षण जो दृश्य प्रकट हुआ, उसे देखकर सारी अयोध्या स्तब्ध रह गई। हनुमान जी के हृदय के भीतर, अपने पूरे दिव्य वैभव के साथ, श्रीराम और माता सीता विराजमान थे। मानो हनुमान जी का सारा शरीर एक मंदिर हो और उस मंदिर के गर्भगृह में स्वयं सीता-राम बैठे हों। जिन नेत्रों ने यह देखा, वे धन्य हो गए; जिन होंठों ने उपहास किया था, वे अब स्तुति करने लगे।
श्रीराम स्वयं सिंहासन से उठ खड़े हुए। उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बह निकले। उन्होंने दौड़कर अपने परम भक्त हनुमान को अपने हृदय से लगा लिया और कहा — "हनुमान, तुम्हारे समान भक्त न कभी हुआ, न कभी होगा। तुम्हारी भक्ति ने आज मुझे भी विवश कर दिया।" सारी सभा ने देखा कि जो चीरा हुआ वक्ष था, वह प्रभु के स्पर्श से पुनः पूर्ण और नीरोग हो गया, और उस पर कोई घाव शेष न रहा।
इस अद्भुत घटना ने सभी को यह अटल सत्य समझा दिया कि भक्ति का सच्चा प्रमाण बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि हृदय की उस पवित्रता में है जहाँ केवल भगवान का ही वास होता है। जिस हृदय में राम बसें, वहीं सबसे बड़ा तीर्थ है।
इस कथा का भाव यही है — सच्चा भक्त अपने प्रभु को हृदय में इस प्रकार बसा लेता है कि उसका सारा अस्तित्व ही भगवान का धाम बन जाता है; हनुमान जी का चीरा हुआ वक्ष आज भी भक्ति की चरम पराकाष्ठा का साक्षी है।