
सत्यनारायण व्रत कथा
Satyanarayan Vrat Katha
भगवान विष्णु के सत्यस्वरूप की आराधना का पर्व है सत्यनारायण व्रत। यह व्रत किसी भी शुभ तिथि, विशेषकर पूर्णिमा या संक्रांति के दिन, शुभ कार्यों की सिद्धि, मनोकामना की पूर्ति और घर में सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। इसकी कथा स्वयं भगवान नारायण ने देवर्षि नारद को सुनाई थी, जब नारद जी ने मृत्युलोक के दुःखी प्राणियों के कल्याण का उपाय पूछा। भगवान ने कहा कि सत्यनारायण व्रत से बड़ा कोई सरल और फलदायी व्रत नहीं।
एक समय काशी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण भूख से व्याकुल होकर भटक रहा था। तब भगवान सत्यनारायण एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके पास आए और उसे इस व्रत की महिमा बताई। ब्राह्मण ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और शीघ्र ही उसका दारिद्र्य दूर हो गया, वह धन-धान्य से सम्पन्न हो गया। उसने यह व्रत नियमित रूप से करना आरंभ कर दिया और उसकी कथा जन-जन तक फैल गई।
इसी नगरी में एक लकड़हारा रहता था। एक दिन उसने ब्राह्मण के घर सत्यनारायण की पूजा होते देखी। पूछने पर जब उसे व्रत की महिमा ज्ञात हुई, तो उसने भी संकल्प लिया कि आज जितनी लकड़ी बिकेगी, उसका आधा धन वह व्रत में लगाएगा। उस दिन उसे दुगुना धन प्राप्त हुआ और उसने विधिपूर्वक व्रत किया, जिससे वह भी सुखी और समृद्ध हो गया।
आगे कथा में साधु वैश्य नामक एक व्यापारी का प्रसंग आता है। संतानहीन साधु वैश्य ने पुत्र-प्राप्ति की कामना से यह व्रत किया और उसे कलावती नामक सुंदर कन्या की प्राप्ति हुई। किंतु कन्या के विवाह की व्यस्तता में वह व्रत का प्रसाद ग्रहण करना भूल गया, जिससे भगवान रुष्ट हो गए। व्यापार में उस पर झूठा आरोप लगा और वह तथा उसका दामाद राजा के कारागार में बंद कर दिए गए, उनका सारा धन भी छिन गया।
घर पर कलावती और उसकी माता लीलावती अत्यंत कष्ट में पड़ गईं। एक दिन थकी-हारी कलावती को एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण व्रत का प्रसाद मिला, तब उन्हें भूली हुई भूल का स्मरण हुआ। लीलावती ने भक्ति और पश्चाताप के साथ पुनः विधिपूर्वक व्रत किया और भगवान से क्षमा माँगी। भगवान की कृपा से साधु वैश्य और उसका दामाद निर्दोष सिद्ध हुए, सम्मान सहित मुक्त हुए और उनका खोया हुआ धन कई गुना होकर लौट आया।
इस व्रत की विधि सरल है — भक्त स्नान कर स्वच्छ स्थान पर चौकी सजाते हैं, भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करते हैं, केला, पंचामृत, तुलसीदल और विशेष रूप से गेहूँ के आटे, शक्कर और केले से बना "सिन्नी" या चूरमा-प्रसाद अर्पित करते हैं। पाँचों अध्यायों की कथा श्रद्धापूर्वक सुनी जाती है और अंत में आरती कर प्रसाद वितरित किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण नियम है कि प्रसाद अवश्य ग्रहण किया जाए और उसका अनादर न हो।
इस व्रत की महिमा यह है कि जो भक्त सच्चे मन से सत्यनारायण भगवान का व्रत और कथा-श्रवण करता है, उसके सभी संकट दूर होते हैं, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और घर में सुख-शांति व लक्ष्मी का निवास होता है। यह व्रत सिखाता है कि सत्य और भक्ति में अटूट निष्ठा ही जीवन के हर संकट से उबारती है। जय सत्यनारायण भगवान की।