
जन्माष्टमी व्रत कथा
Janmashtami Vrat Katha
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, जब आकाश में रोहिणी नक्षत्र का शुभ योग होता है और रात्रि अपने गहनतम अंधकार में डूबी होती है — यही वह पावन घड़ी है जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण ने इस धरा पर अवतार लिया था। द्वापर युग में मथुरा नगरी अत्याचारी कंस के शासन से त्रस्त थी। कंस ने भविष्यवाणी सुन ली थी कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसके अंत का कारण बनेगा। इसी भय से उसने अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को कारागार में डाल दिया और एक-एक करके उनकी संतानों का वध करता रहा।
समय बीतता गया और वह पावन रात्रि आई जब देवकी के गर्भ से आठवें पुत्र के रूप में स्वयं नारायण प्रकट हुए। कारागार शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए दिव्य शिशु के तेज से जगमगा उठा। भगवान ने माता-पिता को उनका पूर्व रूप स्मरण कराया और आदेश दिया कि इस शिशु को गोकुल में नंद-यशोदा के यहाँ पहुँचा दिया जाए। उसी क्षण कारागार के प्रहरी गहरी निद्रा में सो गए, बेड़ियाँ अपने आप खुल गईं और द्वार खुल गए।
वसुदेव जी शिशु कृष्ण को टोकरी में रखकर उमड़ती हुई यमुना को पार करने चले। घनघोर वर्षा हो रही थी, किंतु शेषनाग ने अपने फणों का छत्र बनाकर शिशु को भीगने से बचाया। यमुना ने भी अपने जल को घटाकर मार्ग दिया ताकि प्रभु के चरण स्पर्श कर सके। वसुदेव जी ने गोकुल पहुँचकर उसी रात जन्मी यशोदा की कन्या के बदले कृष्ण को वहाँ रख दिया और कन्या को लेकर लौट आए। प्रातःकाल गोकुल में नंदलाल के जन्म का उत्सव मनाया गया।
इस पर्व की व्रत विधि अत्यंत सरल और भावपूर्ण है। भक्त प्रातःकाल स्नान कर संकल्प लेते हैं और दिनभर निराहार या फलाहार व्रत रखते हैं। मध्यरात्रि, जो कृष्ण जन्म का समय है, तक जागरण किया जाता है। बाल गोपाल की मूर्ति को पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद और शक्कर — से स्नान कराया जाता है, नवीन वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं, झूला सजाया जाता है और पालने में विराजमान गोपाल को झुलाया जाता है।
ठीक रात्रि के बारह बजे शंख और घंटियों की ध्वनि के बीच "नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की" का जयघोष गूँज उठता है। भक्तगण माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी और छप्पन भोग अर्पित करते हैं। इस दिन दही-हांडी की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसमें बाल कृष्ण की माखनचोरी की लीला का स्मरण किया जाता है और युवक ऊँचाई पर बँधी हांडी फोड़कर उल्लास मनाते हैं।
इस व्रत की महिमा अपार है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से जन्माष्टमी का व्रत करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। घर में सुख, समृद्धि और संतान-सौख्य की प्राप्ति होती है और अंत में वह गोलोक धाम को प्राप्त करता है। यह व्रत भक्त को यह सिखाता है कि अधर्म चाहे कितना ही बलशाली क्यों न हो, धर्म और सत्य की रक्षा के लिए स्वयं भगवान अवतार लेते हैं। जय श्रीकृष्ण, जय नंदलाल।