
होली और ब्रज की लट्ठमार परंपरा
Holi aur Braj ki Lathmar Parampara
फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रंगों का पर्व होली सम्पूर्ण भारत में उल्लास और प्रेम का प्रतीक है, किंतु ब्रजभूमि की होली की छटा तो सारे संसार में निराली है। यहाँ होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि राधा और कृष्ण के अमर प्रेम का रंगोत्सव है, जो पूरे चालीस दिनों तक ब्रज के गाँव-गाँव में गूँजता रहता है। इसी ब्रज की होली का सबसे मनोहर और प्रसिद्ध रूप है — बरसाना और नंदगाँव की लट्ठमार होली।
इस अनूठी परंपरा के पीछे एक मधुर लीला की कथा है। कहते हैं कि बाल्यकाल में श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ नंदगाँव से राधा जी के गाँव बरसाना जाते और वहाँ की गोपियों के साथ ठिठोली करते, उन पर रंग डालते और हँसी-मज़ाक करते थे। कृष्ण साँवले थे और राधा गोरी — इसी को लेकर वे राधा से प्रेमपूर्वक शिकायत भी करते और गोपियों को छेड़ते। गोपियाँ इस छेड़छाड़ का उत्तर हाथों में लाठियाँ लेकर, प्रेम भरे रोष के साथ, कृष्ण और उनके ग्वाल-बालों को दौड़ाकर देतीं।
यही मधुर लीला आज लट्ठमार होली के रूप में जीवंत होती है। होली से कुछ दिन पूर्व नंदगाँव के हुरियारे (पुरुष) बरसाना पहुँचते हैं और गीत गाते हुए बरसाने की हुरियारिनों (स्त्रियों) को छेड़ते हैं। इसके उत्तर में बरसाने की स्त्रियाँ हाथों में लट्ठ (लाठी) लेकर प्रेमपूर्वक उन पर बरसाती हैं, और पुरुष ढाल तथा चमड़े के कवच से अपनी रक्षा करते हुए यह आनंद स्वीकार करते हैं। इसमें न क्रोध होता है, न वैर — केवल राधा-कृष्ण के प्रेम की पुनरावृत्ति और भक्ति का उल्लास होता है। अगले दिन यही लीला नंदगाँव में दोहराई जाती है, जब बरसाने के पुरुष वहाँ जाते हैं।
बरसाना की होली का केंद्र है श्रीजी मंदिर, जहाँ रंग, अबीर-गुलाल और केसर के छींटों के बीच "राधे-राधे" और "श्री राधे गोरी, नटवर कारे" के गीत गूँजते हैं। पूरा आकाश गुलाल से रंग जाता है और वातावरण भक्ति-रस में डूब जाता है। इसके अतिरिक्त वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर की होली, गोकुल की छड़ीमार होली और मथुरा के फूलों की होली भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं, जहाँ रंग के स्थान पर पुष्पों की वर्षा से भक्तगण भगवान के साथ होली खेलते हैं।
होली से पूर्व की रात्रि में होलिका दहन की परंपरा भी निभाई जाती है, जो भक्त प्रह्लाद की कथा से जुड़ी है — जिसमें भगवान विष्णु की भक्ति ने प्रह्लाद को अग्नि में भी सुरक्षित रखा और अहंकारी होलिका जलकर भस्म हो गई। यह असत्य पर सत्य और अभिमान पर भक्ति की विजय का प्रतीक है। अगले दिन रंगों की होली में सभी भेदभाव मिट जाते हैं और लोग प्रेमपूर्वक एक-दूसरे को गुलाल लगाकर गले मिलते हैं।
ब्रज की होली और लट्ठमार परंपरा की महिमा यह है कि यह हमें सिखाती है कि भक्ति में कठोरता नहीं, केवल प्रेम, हास्य और समर्पण का रस है। यहाँ स्त्री का लट्ठ भी प्रेम है और पुरुष की सहनशीलता भी भक्ति है। जो भक्त इस उत्सव में राधा-कृष्ण के प्रेम का स्मरण करता है, उसके जीवन से वैर-विरोध मिटकर प्रेम, आनंद और मधुरता का संचार होता है। बोलो — बरसाने वाली राधे की जय, नंदगाँव वाले कृष्ण कन्हैया की जय।