
गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की कथा
Govardhan Puja aur Annakut ki Katha
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व ब्रजभूमि की सबसे मनोहर लीलाओं में से एक की स्मृति दिलाता है। यह वह कथा है जिसमें बाल कृष्ण ने प्रकृति की पूजा और भक्ति के सच्चे स्वरूप का संदेश दिया, और स्वयं इंद्र के अहंकार को विनम्रता में बदल दिया।
गोकुल में परंपरा थी कि प्रतिवर्ष ब्रजवासी देवराज इंद्र की पूजा करते थे, इस विश्वास से कि इंद्र ही वर्षा कराते हैं जिससे फसल उगती है और गायों को चारा मिलता है। एक बार जब नंदबाबा और अन्य गोपजन इंद्र-यज्ञ की तैयारी कर रहे थे, तब बालक कृष्ण ने अपने पिता से पूछा कि यह विशाल आयोजन किसके लिए हो रहा है। नंदबाबा ने इंद्र की महिमा बताई। तब कृष्ण ने बड़े प्रेम से समझाया कि वास्तव में ब्रजवासियों का जीवन तो गिरिराज गोवर्धन पर निर्भर है, क्योंकि वही पर्वत गायों को घास, वृक्षों को जल और सभी को आश्रय देता है।
कृष्ण के वचनों से प्रभावित होकर ब्रजवासियों ने इंद्र-पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा आरंभ की। उन्होंने छप्पन प्रकार के व्यंजन, अन्न और पकवानों का विशाल पर्वताकार ढेर बनाकर गिरिराज को अर्पित किया — यही अन्नकूट कहलाया। भक्तिपूर्वक परिक्रमा की गई और गायों को सजाकर पूजा गया। यह देखकर देवराज इंद्र क्रोधित हो उठे कि उनकी पूजा छोड़कर एक पर्वत को पूजा जा रहा है।
अहंकार में भरे इंद्र ने प्रलयंकारी मेघों को आदेश दिया कि वे ब्रज पर मूसलाधार वर्षा करें। दिन-रात लगातार घनघोर वर्षा होने लगी, बिजली कड़कने लगी और ब्रज में जलप्रलय की स्थिति बन गई। भयभीत ब्रजवासी अपनी गायों और बच्चों के साथ कृष्ण की शरण में आए। तब सात वर्ष के बालक श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर सम्पूर्ण गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और उसे एक विशाल छत्र के समान तान दिया।
समस्त ब्रजवासी अपनी गायों सहित पर्वत के नीचे सुरक्षित शरण पा गए। सात दिन और सात रात तक कृष्ण ने बिना थके, बिना विचलित हुए, अंगुली पर पर्वत साधे रखा। अंततः इंद्र का अहंकार टूट गया और उन्होंने पहचान लिया कि यह बालक कोई साधारण नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु का अवतार है। वे लज्जित होकर प्रभु के चरणों में आए, क्षमा माँगी और वर्षा रोक दी। तब से कृष्ण "गिरिधर" कहलाए।
इस पर्व पर आज भी घर-घर में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है, उसे फूलों से सजाया जाता है और अन्नकूट अर्थात अनेक प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। मंदिरों में विशाल छप्पन भोग सजते हैं और गोवर्धन की परिक्रमा की जाती है। इस पर्व की महिमा यह है कि यह मनुष्य को अहंकार त्यागकर प्रकृति, गौ-सेवा और भगवान की शरणागति का पावन संदेश देता है। जो भक्त श्रद्धा से गोवर्धन पूजा करता है, उस पर गिरिधारी की कृपा सदा बरसती रहती है और उसके घर में अन्न-धन का कभी अभाव नहीं होता।