
संकटमोचन मंदिर, वाराणसी — तुलसीदास द्वारा स्थापना
Sankat Mochan Mandir, Varanasi — Tulsidas Dwara Sthapna
पावन काशी नगरी, जो भगवान शिव की राजधानी कही जाती है, वहीं गंगा तट के समीप विराजते हैं श्री संकटमोचन हनुमान जी। यह मंदिर केवल एक पूजास्थल नहीं, बल्कि रामभक्ति और गुरु-भक्ति के अनुपम संगम का जीवंत प्रमाण है। इस मंदिर की स्थापना का श्रेय रामचरितमानस के रचयिता, महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी को जाता है, जिन्हें स्वयं हनुमान जी ने दर्शन देकर कृतार्थ किया था।
कथा प्रचलित है कि गोस्वामी तुलसीदास जी काशी में रहकर राम-कथा का प्रवचन और रचना किया करते थे। उनके हृदय में प्रभु श्रीराम के दर्शन की तीव्र अभिलाषा थी। कहते हैं कि हनुमान जी नित्य किसी वेश में उनकी कथा सुनने आया करते थे। तुलसीदास जी ने अपनी भक्ति और विवेक से उन्हें पहचान लिया और उनके चरण पकड़कर श्रीराम के दर्शन कराने की विनती की। हनुमान जी ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और चित्रकूट में प्रभु श्रीराम के दर्शन का मार्ग प्रशस्त किया।
इसी दिव्य कृपा के फलस्वरूप तुलसीदास जी ने काशी में उसी स्थान पर, जहाँ हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिए थे, संकटमोचन हनुमान जी की स्थापना की। इसीलिए यह मंदिर तुलसीदास जी की भक्ति और हनुमान जी की कृपा का साक्षात प्रतीक है। मान्यता है कि जिस स्थान पर आज मंदिर है, वहीं बैठकर तुलसीदास जी ने हनुमान जी की आराधना की थी। यही कारण है कि यहाँ हनुमान चालीसा और रामचरितमानस का विशेष महत्व है।
संकटमोचन नाम का अर्थ ही है — संकटों को हरने वाले। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से यहाँ आकर बजरंगबली के समक्ष अपना दुख कहता है, उसके सारे कष्ट, बाधाएँ और संकट दूर हो जाते हैं। मंगलवार और शनिवार को यहाँ भक्तों का सैलाब उमड़ता है, और पूरे परिसर में हनुमान चालीसा तथा सुंदरकांड की गूँज से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
इस मंदिर की एक और विशेषता यहाँ का सुंदर परिसर और बंदरों की स्वच्छंद उपस्थिति है, जिन्हें भक्त हनुमान जी का ही रूप मानकर आदर देते हैं। यहाँ चढ़ाया जाने वाला बूँदी के लड्डू का प्रसाद अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसे भक्त श्रद्धापूर्वक ग्रहण करते हैं। प्रतिवर्ष यहाँ संगीत समारोह भी आयोजित होता है, जिसमें देश के महान कलाकार बजरंगबली को अपनी स्वर-साधना अर्पित करते हैं।
संकटमोचन मंदिर की महिमा यही सिखाती है कि जहाँ सच्ची भक्ति और गुरु के प्रति समर्पण हो, वहाँ स्वयं प्रभु और उनके परम सेवक प्रकट हो जाते हैं। तुलसीदास जी की अटूट रामभक्ति से पवित्र हुआ यह धाम आज भी काशी की आत्मा में बसा है। जो भी यहाँ शीश झुकाता है, संकटमोचन उसके जीवन के हर विघ्न को हर लेते हैं और उसे राम-नाम की अनन्त शांति का वरदान देते हैं।