
नमक्कल अंजनेय स्वामी की दक्षिण भारतीय कथा
Namakkal Anjaneyar Swami Ki Dakshin Bharatiya Katha
दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में स्थित नमक्कल नगर अपने अद्भुत अंजनेय स्वामी मंदिर के लिए विख्यात है। यहाँ विराजते हैं विशाल स्वरूप वाले श्री हनुमान जी, जिन्हें दक्षिण में अंजनेयर स्वामी कहा जाता है। यह मंदिर अपनी अनूठी परंपरा और भव्य मूर्ति के कारण असंख्य भक्तों की श्रद्धा का केंद्र है। यहाँ की कथा भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार और हनुमान जी की अनन्य भक्ति के मधुर संबंध को दर्शाती है।
नमक्कल की एक विशाल पहाड़ी है, जिस पर स्थित प्राचीन किले और नरसिंह स्वामी के मंदिर हैं। मान्यता है कि हनुमान जी इसी पहाड़ी के समक्ष खड़े होकर भगवान नरसिंह और श्रीराम की आराधना करते हैं। यहाँ की अंजनेयर मूर्ति अत्यंत विशाल और खुले आकाश के नीचे विराजमान है — इसके ऊपर कोई छत नहीं, क्योंकि माना जाता है कि यह मूर्ति निरंतर बढ़ती रहती है, अतः किसी छत के भीतर इसे नहीं बाँधा जा सकता। यह विशेषता इस मंदिर को समूचे भारत में विशिष्ट बनाती है।
स्थानीय कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने इसी पर्वत पर तपस्या की थी और यहाँ नरसिंह स्वामी का प्राकट्य हुआ। हनुमान जी उनके परम भक्त के रूप में उनके सम्मुख विराजे और अपनी अंजलि जोड़कर सदैव प्रभु का ध्यान करते रहे। कहा जाता है कि अंजनेय स्वामी की दृष्टि सदा नरसिंह स्वामी और श्रीराम की ओर रहती है, मानो वे अनवरत अपने आराध्य की सेवा और स्तुति में लीन हों। यही भाव इस स्थान को भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक बनाता है।
नमक्कल के अंजनेय स्वामी की मूर्ति लगभग अठारह फीट ऊँची है और एक ही पाषाण-शिला से निर्मित मानी जाती है। हाथ जोड़े, विनम्र मुद्रा में खड़े बजरंगबली का यह स्वरूप सेवा, समर्पण और दास्य-भक्ति का साक्षात दर्शन कराता है। इस अंजलि-मुद्रा में खड़े हनुमान जी को देखकर भक्त स्वयं भी नतमस्तक हो जाते हैं और उनके हृदय में विनम्रता तथा भक्ति का भाव जाग उठता है।
इस मंदिर की परंपरा में वड़माला अर्थात वड़े (उड़द के पकवान) की माला अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते हैं और अंजनेय स्वामी के चरणों में प्रार्थना करते हैं। हनुमान जयंती तथा विशेष पर्वों पर यहाँ भव्य उत्सव होते हैं, जिनमें दक्षिण भारतीय भक्ति-संगीत और वैदिक मंत्रोच्चार से वातावरण दिव्य हो उठता है। शनिवार को यहाँ विशेष अभिषेक और अर्चना होती है।
नमक्कल अंजनेय स्वामी की महिमा यही सिखाती है कि सच्ची भक्ति दिशा और भाषा की सीमाओं से परे है। उत्तर हो या दक्षिण, बजरंगबली सर्वत्र अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनके संकट हरते हैं। हाथ जोड़े, प्रभु के ध्यान में लीन यह अंजनेय-स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन का सर्वोच्च सुख अपने आराध्य की सेवा में समर्पित हो जाने में है। जो भी यहाँ श्रद्धा से नमन करता है, उसे साहस, रक्षा और अखंड भक्ति का वरदान प्राप्त होता है।