Kabir Das

Ab To Sara Hi Dukh Bhoolgi

अब तो सारा ही दुःख भूलगी

👁 2 views
▶ यहीं चलाएँ · Play here
Text size:
अब तो सारा ही दुःख भूलगी म्हारी हेली, राम रतन धन पाय। ॥ टेक ॥ पतिवरता पीहर बसे म्हारी हेली, हिरदे पियाजी रो ध्यान। आठ पहर लिव लाग रही म्हारी हेली, ऐसो है आत्म ज्ञान ॥1॥ पुरुष विदेही खेले आंगणे म्हारी हेली, खेल रयो निराधार। गूंगे मन सपनो भयो म्हारी हेली, समझ-समझ हर्षाय ॥2॥ और सखी पीली भई म्हारी हेली, तू क्यूं भई रंग लाल। अविनाशी री सेज में म्हारी हेली, पोढ़त हो गई निहाल ॥3॥ अविनाशी री सेज रा म्हारी हेली, कहो कैसा उन्मान। केवण सुणण में है नहीं म्हारी हेली, ज्यां पहुंचा परिमाण ॥4॥ नार कहावे पीव री म्हारी हेली, भीतर परदा दोय। नयण मिलावे और से म्हारी हेली, प्रीतम राजी न होय ॥5॥ मिली सुहागण अपने पीव से म्हारी हेली, तन मन कीना वेश। केवे कबीर सा धर्मीदास ने म्हारी हेली, पहुंच्या दीवाने देश ॥6॥

✍️ रचयिता: कबीर दास

Related Bhajans