Kabir Das

Papi Ra Mukh Se Ram Nahi Nikle

पापी रा मुख से राम नहीं निकले

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पापी रा मुख से राम नहीं निकले, केसर धूल गई गारा में। मिनख जमारो बंदा ऐलो मत खोइजै, सुकरत करले जमारा में ॥ टेक ॥ भैस पदमणी ने गहणो फैरायौ, वा काई समझे गहणा में। फेर नहीं जाणै वातो ओठ नहीं जाणै, जाय बैठी गोबर गारा में ॥1॥ सोना री थाली में भंडुरी ने पुरस्यो, वा काई समझे जिमणा में। जीम नहीं जाणै वातो चुट नहीं जाणै, हुड़ हुड़ खोयौ जमारा ने ॥2॥ कांच रा महल में कुतिया बैठोणी, वा काई समझे महलो में। एक एक कांच माहि दोय दोय दिसै, भुस भुस खोयौ जमात ने ॥3॥ माला ले मुर्ख ने दिनी, वो काई समझे माला में। फेर नही जाणै वोतो भज नही जाणै, मेल दिनी उंडा आला में ॥4॥ राम नाम री ढाल बणाइदौ, दया धर्म तलवारा ने। कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब जीतो जम द्वारा ने ॥5॥

✍️ रचयिता: कबीर दास

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