
सिंदूरासुर वध — सिंदूर चढ़ाने की परंपरा
Sindurasura Vadh — Sindoor Chadhane Ki Parampara
प्राचीन काल की बात है, जब पृथ्वी पर धर्म का प्रकाश धीरे-धीरे मलिन होने लगा था। उन्हीं दिनों सिंदूर नामक एक महाबली असुर का उदय हुआ। वह जन्म से ही अत्यंत तेजस्वी और बलशाली था, किन्तु उसका बल अहंकार में बदल गया। उसने घोर तप करके अनेक वरदान प्राप्त किए और स्वयं को अजेय समझने लगा। उसका रंग रक्त के समान लाल था और उसके शरीर से जो आभा निकलती, वह चारों दिशाओं को भयभीत कर देती थी। धीरे-धीरे उसने देवताओं, ऋषियों और सज्जनों पर अत्याचार आरम्भ कर दिया।
सिंदूरासुर के अत्याचार इतने बढ़ गए कि यज्ञ रुक गए, तपस्वियों का तप भंग होने लगा और स्वर्ग तक उसके भय की छाया पहुँच गई। देवता व्याकुल होकर एकत्र हुए और उन्होंने विचार किया कि इस असुर का अंत केवल विघ्नहर्ता श्रीगणेश ही कर सकते हैं, क्योंकि वे ही समस्त विघ्नों और अधर्म का नाश करने वाले हैं। सब मिलकर गजानन की शरण में गए और करुण स्वर में प्रार्थना की—"हे लम्बोदर, हे विघ्नराज! इस अभिमानी असुर से हमारी रक्षा कीजिए और धर्म की पुनः स्थापना कीजिए।"
भक्तवत्सल श्रीगणेश ने देवताओं की पुकार सुनी और उन्हें अभय का वचन दिया। वे अपने विशाल स्वरूप में प्रकट हुए—गजमुख, चतुर्भुज, तेजोमय। उनके एक हाथ में पाश, दूसरे में अंकुश और मुख पर स्थिर, करुणामयी मुस्कान थी। जब यह समाचार सिंदूरासुर तक पहुँचा कि गणेश उससे युद्ध करने आ रहे हैं, तो वह क्रोध और गर्व से भर उठा और अपनी विशाल सेना लेकर रणभूमि में आ डटा।
घोर संग्राम आरम्भ हुआ। सिंदूरासुर अपने बल और मायाजाल से अनेक भयानक रूप धारण करता, किन्तु गणेशजी की सूझबूझ और शक्ति के आगे उसकी सारी माया छिन्न-भिन्न हो जाती। श्रीगणेश ने अपने पाश से उसकी सेना को बाँध दिया और अंकुश से उसके अहंकार को चूर कर दिया। अंततः विघ्नहर्ता ने उस असुर को पकड़कर उसका मस्तक ग्रहण किया और उसके रक्त—अर्थात लाल सिंदूर—को अपने मस्तक तथा सम्पूर्ण शरीर पर लगा लिया। इस प्रकार अधर्म का नाश हुआ और तीनों लोकों में आनंद की लहर दौड़ गई।
देवताओं ने पुष्पवृष्टि की, ऋषियों ने वेदमंत्रों से स्तुति की और गन्धर्वों ने मंगलगान गाया। श्रीगणेश का सिंदूर से रँगा हुआ स्वरूप इतना मनोहर और तेजस्वी दिखाई दे रहा था कि सब भाव-विभोर हो उठे। तभी से यह मान्यता स्थिर हुई कि गणपति को सिंदूर अत्यंत प्रिय है, क्योंकि वही उनके असुर-विजय और अधर्म-नाश का प्रतीक है।
आज भी जब कोई भक्त श्रीगणेश की प्रतिमा पर श्रद्धापूर्वक सिंदूर अर्पित करता है, तो वह इसी कथा का स्मरण करता है। कहा जाता है कि गणेशजी को सिंदूर चढ़ाने से विघ्न दूर होते हैं, बुद्धि निर्मल होती है और घर में शुभता का वास होता है। यही कारण है कि मंगलमूर्ति की पूजा में सिंदूर का विशेष स्थान है।
सिंदूरासुर वध की यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार चाहे कितना भी बलशाली क्यों न हो, विनम्रता और धर्म के आगे उसका नाश निश्चित है। जो भक्त गणपति के इस लीला-चरित्र का स्मरण करता है, उसके जीवन के सारे विघ्न शांत होते हैं और उस पर विघ्नहर्ता की कृपा सदा बनी रहती है। जय श्रीगणेश।