
देवांतक और नरांतक वध
Devantak Aur Narantak Vadh
यह कथा उस समय की है जब पृथ्वी और स्वर्ग पर दो भयंकर असुर भाइयों—देवांतक और नरांतक—का आतंक छाया हुआ था। देवांतक का अर्थ है 'देवताओं का अंत करने वाला' और नरांतक का अर्थ है 'मनुष्यों का अंत करने वाला'। नाम के अनुरूप ही ये दोनों अपने-अपने क्षेत्र में अत्याचार की सीमा लाँघ चुके थे। घोर तप करके उन्होंने ऐसे वरदान प्राप्त कर लिए थे कि सामान्य देवता भी उनका सामना करने में असमर्थ हो गए। उनके अहंकार और बल के आगे धर्म का ध्वज झुकने लगा।
देवांतक ने स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को त्रस्त कर दिया, जबकि नरांतक ने पृथ्वी पर मनुष्यों, ऋषियों और यज्ञकर्ताओं का जीना दूभर कर दिया। यज्ञवेदियाँ उजड़ने लगीं, वेदपाठ रुक गए और सज्जनों की पुकार आकाश तक गूँजने लगी। देवता और ऋषिगण मिलकर भक्तवत्सल श्रीगणेश की शरण में गए। उन्होंने आर्त स्वर में प्रार्थना की—"हे विघ्नहर्ता! इन दोनों असुरों ने धर्म को कुचल दिया है, अब आप ही हमारी एकमात्र आशा हैं। कृपया अवतार लेकर हमारी रक्षा कीजिए।"
देवताओं की करुण पुकार सुनकर श्रीगणेश ने अत्यंत तेजस्वी स्वरूप धारण किया। वे मयूर पर विराजमान होकर, अनेक भुजाओं में दिव्य आयुध लिए हुए प्रकट हुए। उनका यह रूप इतना प्रचंड और मंगलमय था कि देवताओं का भय क्षण भर में जाता रहा और उनके हृदय में विजय का विश्वास जाग उठा। विघ्नराज ने दोनों असुरों को धर्म के मार्ग पर लौटने का अवसर देने के लिए संदेश भेजा, परन्तु अहंकार में अंधे हो चुके देवांतक और नरांतक ने उस अवसर को ठुकरा दिया।
अब घोर संग्राम अनिवार्य हो गया। पहले नरांतक अपनी विशाल सेना लेकर रणभूमि में आया। उसने अपनी माया और बल से आकाश को धूल से ढँक दिया, किन्तु श्रीगणेश ने अपने दिव्य अस्त्रों से उसकी सारी माया का शमन कर दिया और उसके अभिमान का अंत करते हुए अधर्म के इस प्रतीक को शांत कर दिया। अपने भाई का पतन देखकर देवांतक क्रोध से भर उठा और स्वयं युद्धभूमि में कूद पड़ा।
देवांतक के साथ हुआ युद्ध और भी भीषण था। वह बार-बार रूप बदलता, नई-नई मायाएँ रचता और गणेशजी को थकाने का प्रयास करता। परन्तु विघ्नहर्ता की धैर्यशक्ति और बुद्धि अपार थी। उन्होंने शांत मन से उसकी हर चाल को निष्फल किया और अंततः अपने अंकुश तथा दिव्य आयुध से देवांतक के अहंकाररूपी अंधकार को समाप्त कर दिया। दोनों असुरों के पतन के साथ ही तीनों लोकों में धर्म की पुनः स्थापना हो गई।
इस महान विजय पर देवताओं ने आकाश से पुष्पवृष्टि की, ऋषियों ने वेदमंत्रों से गणपति की स्तुति की और सम्पूर्ण सृष्टि में शांति, आनंद और मंगल का संचार हुआ। देवगण पुनः अपने स्थानों पर लौटे, यज्ञ फिर से प्रारम्भ हुए और पृथ्वी पर धर्म का प्रकाश उज्ज्वल हो उठा। श्रीगणेश की जय-जयकार से दिशाएँ गूँज उठीं।
देवांतक और नरांतक वध की यह कथा हमें यह भाव देती है कि 'देवांतक' और 'नरांतक' केवल बाहरी असुर नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अहंकार, क्रोध और अधर्ममय विचारों के भी प्रतीक हैं। जो भक्त श्रीगणेश का स्मरण करता है, उसके भीतर के ये असुर भी शांत हो जाते हैं और उसका जीवन धर्म, विवेक और शांति से भर जाता है। विघ्नहर्ता की यह लीला सदा यही सन्देश देती है कि सच्ची भक्ति के आगे कोई भी अंधकार टिक नहीं सकता। जय श्रीगणेश, जय विघ्नविनाशक।