Gajamukhasura Vadh

गजमुखासुर वध

Gajamukhasura Vadh

सृष्टि के आरम्भ से ही जब-जब अधर्म बढ़ा है, तब-तब भगवान ने किसी न किसी रूप में अवतार लेकर उसका शमन किया है। ऐसी ही एक कथा गजमुखासुर की है, जो अपने घोर तप और अहंकार के कारण देवताओं तथा ऋषियों के लिए भारी संकट बन गया था। यह असुर हाथी के समान विशाल मुख वाला और अपार बलशाली था। उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके ऐसे वरदान प्राप्त कर लिए थे, जिनसे वह किसी भी अस्त्र-शस्त्र से अवध्य हो गया।

वरदान पाकर गजमुखासुर उन्मत्त हो उठा। उसने देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया, यज्ञों का हविष्य छीन लिया और साधु-संतों को त्रस्त करने लगा। उसके भय से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवगण अपने प्राणों की रक्षा के लिए इधर-उधर भटकने लगे और अंत में सब मिलकर विघ्नहर्ता श्रीगणेश की शरण में पहुँचे। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की—"हे गजानन! आप ही समस्त विघ्नों के नाशक हैं, इस दुष्ट से हमारी रक्षा कीजिए।"

करुणासागर श्रीगणेश ने देवताओं को अभय दिया और गजमुखासुर के संहार के लिए प्रस्थान किया। जब असुर ने देखा कि गणेशजी उससे युद्ध करने आ रहे हैं, तो वह अपनी विशाल सेना और मायाशक्ति के साथ रणभूमि में उतर आया। दोनों ओर से घोर संग्राम छिड़ गया। गजमुखासुर बार-बार अपने रूप बदलता और छल-कपट से गणेशजी को परास्त करने का प्रयास करता, परन्तु विघ्नराज की बुद्धि और शक्ति के आगे उसकी हर चाल विफल हो जाती।

युद्ध के मध्य गजमुखासुर ने अपने वरदान के बल पर स्वयं को मूषक के रूप में परिवर्तित कर लिया, यह सोचकर कि इस छोटे रूप में वह बच निकलेगा। किन्तु विघ्नहर्ता तो त्रिकालदर्शी हैं। उन्होंने तत्काल उस मूषक को पकड़ लिया और उसे अपने वश में कर लिया। असुर का सारा अभिमान चूर हो गया और वह गणेशजी के चरणों में गिर पड़ा। उसका अधर्ममय स्वभाव उसी क्षण नष्ट हो गया और वह विनम्र होकर क्षमा-याचना करने लगा।

श्रीगणेश ने अपनी करुणा से उस पर दया की और उसे अपना वाहन बना लिया। तभी से मूषक गणपति का प्रिय वाहन कहलाया, जो इस बात का प्रतीक है कि विघ्नहर्ता की कृपा से बड़े से बड़ा अहंकार भी विनम्रता में बदल सकता है। इस विजय पर देवताओं ने पुष्पवर्षा की, गन्धर्वों ने मंगलगान गाया और सम्पूर्ण सृष्टि में शांति और आनंद की स्थापना हुई।

गजमुखासुर वध की यह पावन कथा हमें यह भाव देती है कि अहंकार और छल कितने भी प्रबल क्यों न हों, भगवान की भक्ति और धर्म के मार्ग के आगे उनका ठहरना असम्भव है। जो व्यक्ति अपने भीतर के अहंकाररूपी असुर को गणपति के चरणों में समर्पित कर देता है, उसका जीवन निर्मल और मंगलमय हो जाता है। श्रीगणेश की यह लीला हर भक्त को यही सन्देश देती है कि विनम्रता ही सबसे बड़ा बल है। जय गजानन, जय विघ्नहर्ता।

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