
हनुमान चालीसा की रचना — तुलसीदास और अकबर की कथा
Hanuman Chalisa Ki Rachna — Tulsidas aur Akbar Ki Katha
गोस्वामी तुलसीदास जी रामभक्ति की साक्षात मूर्ति थे। उनके हृदय में दिन-रात केवल प्रभु श्रीराम और उनके परम सेवक हनुमान जी का ही वास था। जहाँ-जहाँ राम-कथा होती, वहाँ हनुमान जी अवश्य उपस्थित रहते — यह विश्वास तुलसीदास जी के रोम-रोम में बसा था। उनकी वाणी में इतनी भक्ति और सामर्थ्य थी कि जो भी सुनता, उसका मन राम की ओर मुड़ जाता। ऐसे संत की कीर्ति धीरे-धीरे सारे भारतवर्ष में फैल गई और अंततः दिल्ली के बादशाह अकबर के दरबार तक भी पहुँची।
कहा जाता है कि अकबर ने तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलवाया और उनसे कोई चमत्कार दिखाने को कहा। तुलसीदास जी ने विनम्रता से उत्तर दिया कि वे तो केवल राम के दास हैं, चमत्कार दिखाने वाले जादूगर नहीं। उनका काम प्रभु का गुणगान करना है, तमाशा दिखाना नहीं। इस उत्तर से रुष्ट होकर बादशाह ने संत को बंदी बनाकर कारागार में डलवा दिया। पर जिसके हृदय में राम और हनुमान बसते हों, उसे कोई कारागार कैसे बाँध सकता है!
कारागार की उस अँधेरी कोठरी में तुलसीदास जी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने आराध्य के परम भक्त, संकटमोचन हनुमान जी का ध्यान किया और उनकी स्तुति में मन लगा दिया। कहते हैं कि इसी अवसर पर, हनुमान जी की महिमा और शक्ति का स्मरण करते हुए, उनके हृदय से चालीस चौपाइयों वाली वह अमर स्तुति प्रकट हुई जिसे संसार आज हनुमान चालीसा के नाम से जानता है। यह रचना किसी बाहरी प्रेरणा से नहीं, बल्कि भक्त की पीड़ा और पवनपुत्र के प्रति अटूट श्रद्धा से जन्मी थी।
तुलसीदास जी की यह भक्तिपूर्ण पुकार व्यर्थ नहीं गई। कथा कहती है कि हनुमान जी की कृपा से आगरा नगर में असंख्य वानरों का एक विशाल समूह प्रकट हुआ और उसने बादशाह के महल तथा नगर में उपद्रव मचा दिया। चारों ओर हाहाकार होने लगा और कोई भी उन्हें रोक नहीं पा रहा था। अकबर के विद्वानों ने बादशाह को समझाया कि यह किसी सिद्ध संत के अपमान का परिणाम है।
बादशाह की आँखें खुल गईं। उसने तुरन्त तुलसीदास जी को ससम्मान कारागार से मुक्त कराया और उनसे क्षमा माँगी। संत के मुक्त होते ही तथा उनकी प्रार्थना पर वह उपद्रव शांत हो गया और नगर में फिर से शांति लौट आई। अकबर ने तुलसीदास जी की भक्ति और हनुमान जी की शक्ति दोनों को हृदय से स्वीकार किया और उन्हें आदरपूर्वक विदा किया।
इस प्रकार जो स्तुति एक भक्त के संकट में जन्मी, वही आगे चलकर करोड़ों भक्तों के लिए संकट हरने वाला अमोघ कवच बन गई। हनुमान चालीसा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि तुलसीदास जी की अनन्य भक्ति और हनुमान जी की प्रत्यक्ष कृपा का जीवंत प्रमाण है।
इसकी महिमा यही है कि जो श्रद्धा और शुद्ध मन से हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करता है, उसके सारे भय, बाधाएँ और संकट पवनपुत्र की कृपा से स्वयं दूर हो जाते हैं।