Krishna

Maiya Mori Main Nahi Makhan Khayo (Anup Jalota)

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो

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मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो॥ भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो। चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो। मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो॥ मैं बालक बहियन को छोटो, छींको केहि विध पायो। ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो। मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो॥ तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे लगायो। सूरदास तब बिहँसि जसोदा, ले उर कंठ लगायो। मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो॥

इस भजन के बारे में

यह अत्यंत लोकप्रिय भजन महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें बाल कृष्ण अपनी माता यशोदा से माखन चोरी न करने की सफाई दे रहे हैं। इस पद में नटखट कन्हैया बहुत ही भोलेपन से अपनी माता को समझाते हैं कि वे तो दिन भर गायों के पीछे वन में भटकते रहे, तो फिर इतनी ऊँचाई पर टंगे छींके से माखन कैसे चुरा सकते हैं? वे अपने सखाओं पर दोष मढ़ते हुए कहते हैं कि ये ग्वाल-बाल उनसे जलते हैं और जबरदस्ती उनके मुख पर माखन लगा दिया है। अंत में, माता यशोदा का वात्सल्य भाव जाग उठता है और वे अपने लाडले को गले से लगा लेती हैं।

यह भजन भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप और माता यशोदा के निश्छल प्रेम को समर्पित है। भक्त इसे विशेष रूप से जन्माष्टमी के पावन अवसर पर या घर में बाल गोपाल की सेवा करते समय गाते हैं। इस भजन को गाने या सुनने से मन में भक्ति और वात्सल्य का भाव जागृत होता है, जिससे भक्त स्वयं को कृष्ण की लीलाओं से जुड़ा हुआ महसूस करता है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम कितना सरल और निस्वार्थ होना चाहिए।

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