Hanumat Stuti (Raag Dhanashree)
श्री हनुमत स्तुति — राग धनाश्री (विनय पत्रिका)
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जयति निर्भरानंद-संदोह कपिकेसरी, केसरी-सुवन भुवनैकभर्ता।
दिव्यभूम्यंजना-मंजुलाकर-मणे, भक्त-संतापहर्ता॥ १॥
जयति धर्मार्थ-कामापवर्गद विभो, ब्रम्हलोकादि-वैभव-विरागी।
वचन-मानस-कर्म सत्य-धर्मव्रती, जानकीनाथ-चरणानुरागी॥ २॥
जयति बिहगेश-बलबुद्धि-बेगाति-मद-मथन, मनमथ-मथन, उर्ध्वरेता।
महानाटक-निपुन, कोटि-कविकुल-तिलक, गानगुन-गर्व-गन्धर्व-जेता॥ ३॥
जयति मंदोदरी-केश-कर्षण, विद्यमान दशकंठ भट-मुकुट मानी।
भूमिजा-दु:ख-संजात रोषांतकृत-जातनाजंतु कृत जातुधानी॥ ४॥
जयति रामायण-श्रवण-संजात रोमांच, लोचन सजल, शिथिल वाणी।
रामपदपद्म-मकरंद-मधुकर, पाहि, दास तुलसी शरण, शूलपाणी॥ ५॥