Hanuman Ji

Hanuman Bahuk

श्री हनुमान बाहुक (सम्पूर्ण पाठ)

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॥ श्री हनुमान बाहुक ॥ ॥ मंगलाचरण ॥ श्री गणेशाय नमः। श्री जानकीवल्लभो विजयते॥ ॥ छंद 1 ॥ उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो संभारिये । राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ॥ साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बांधि मारिये । पोखरी बिसाल बांहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यौ पकरि कै बदन बिदारिये ॥ ॥ छंद 2 ॥ राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये । मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ॥ कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पव्वयते, सुथल सुबेल भालू बैठि कैः बिचारिये । महाबीर बांकुरे बराक बांह-पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ॥ ॥ छंद 3 ॥ लोक-परलोकटूं तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूं निहारिये । कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा विचारिये ॥ खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये । बात तरुमूल बंहुसूल कपिकच्छरु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ॥ ॥ छंद 4 ॥ करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बकभगिनी काहू ते कहा डरैगी । बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥ आई है बनाइ बेष आप ही विचारि देख, पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी । पूतना पिसाचिनी ज्यौ कपिकान्ह तुलसी की, बांहपीर महाबीर तेरे मारे मरगी ॥ ॥ छंद 5 ॥ भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन विषम पाप ताप छल छांह की । करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन मांह की ॥ पैटहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नह की । आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बांह की ॥ ॥ छंद 6 ॥ सिंहिका संहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है । लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ॥ तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महतारी है । भीर बांह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ॥ ॥ छंद 7 ॥ तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की । तेरी बांह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहू की ॥ साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की । आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ॥ ॥ छंद 8 ॥ टूकनि को घर-घर डोलत केगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है । कीन्ही है संभार सार अंजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ॥ इतनो परेखो सब भोति समरथ आजु, कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है । सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ॥ ॥ छंद 9 ॥ आपने ही पाप तें त्रिपात ते कि साप तें, बढ़ी है बाह बेदन कही न सहि जाति है । ओषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ॥ करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है । चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कल्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ॥ ॥ छंद 10 ॥ दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को । बांकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ॥ एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को । थोरी बांह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ॥ ॥ छंद 11 ॥ देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं । पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ॥ घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाडत निकेत हैं । क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ॥ ॥ छंद 12 ॥ तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के । तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ॥ तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के । तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ॥ ॥ छंद 13 ॥ पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हरिये । भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ॥ अबु तू हौ अंबुचर, अबु तू हों डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये । बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बांह पर लामी लूम फेरिये ॥ ॥ छंद 14 ॥ घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौ, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है । बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ॥ करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हंसि होकि फूंकि फौजैं ते उड़ाई है । खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ॥ ॥ छंद 15 ॥ राम गुलाम तु ही हनुमान गोसांई, सुसांई सदा अनुकूलो । पाल्यो हौ बाल ज्यों आखर दू, पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ॥ बांह की बेदन बांह पगार, पुकारत आरत आनंद भूलो । श्री रघुबीर निवारिये पीर, रहौ दरबार परो लटि लूलो ॥ ॥ छंद 16 ॥ काल की करालता करम कठिनाई कर्थ, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे । बेदन कुभांति सो सही न जाति राति दिन, सोई बांह गही जो गही समीर डाबरे ॥ लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहूं तावरे । भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ॥ ॥ छंद 17 ॥ पंय पीर पेट पीर बह पीर मुंह पीर, जरजर सकल पीर मई है । देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ॥ हौ तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है । कुंभज के कंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूं भई है ॥ ॥ छंद 18 ॥ बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुंहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं । राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ॥ सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ, जिनके समूह साके जागत जहान हैं । तुलसी संभारि ताडका संहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ॥ ॥ छंद 19 ॥ बालपने सूथे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत मांगि खात टूकटाक हां । परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौ ॥ खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौ । तुलसी गुसांई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ॥ ॥ छंद 20 ॥ असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को । तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ॥ नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को । ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ॥ ॥ समापन दोहा ॥ पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

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