Hanuman Ji

Hanumat Stuti (Jayatyanjani-Garbh)

श्री हनुमत स्तुति — जयत्यंजनी-गर्भ (विनय पत्रिका)

👁 7 views
Hanumat Stuti (Jayatyanjani-Garbh)
Text size:
जयत्यंजनी-गर्भ-अम्बोधि-सम्भूत विधु विबुध-कुल-कैरवानंदकारी। केसरी-चारु-लोचन-चकोरक-सुखद, लोकगन-शोक-संतापहारी॥ १॥ जयति जय बालकपि केलि-कौतुक उदित-चंडकर-मंडल-ग्रासकर्त्ता। राहू-रवि-शक्र-पवि-गर्व-खर्वीकरण शरण-भयहरण जय भुवन-भर्त्ता॥ २॥ जयति रणधीर, रघुवीरहित, देवमणि, रूद्र-अवतार, संसार-पाता। विप्र-सुर-सिद्ध-मुनि-आशिषाकारवपुष, विमलगुण, बुद्धि-वारिधि-विधाता॥ ३॥ जयति सुग्रीव-ऋक्षादी-रक्षण-निपुण, बालि-बलशालि-बध-मुख्यहेतु। जलधि-लंघन सिंह सिंहिका-मद-मथन, रजनीचर-नगर-उत्पात-केतु॥ ४॥ जयति भूनन्दिनी-शोच-मोचन विपिन-दलन घननादवश विगतशंका। लूम लीलानल-ज्वालमालाकुलित होलिकाकरण लंकेश-लंका॥ ५॥ जयति सौमित्रि-रघुनंदनानंद्कर, ऋक्ष-कपि-कटक-संघट-विधायी। बद्ध-वारिधि-सेतु अमर-मंगल-हेतु, भानुकुलकेतु-रण-विजयदायी॥ ६॥ जयति जय वज्रतनु दशन नख मुख विकट, चंड-भुजदंड तरु-शैल-पानी। समर-तैलिक-यन्त्र तिल-तमीचर-निकर, पेरी डारे सुभट घाली घानी॥ ७॥ जयति दशकंठ-घटकर्ण-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालनेमि-हंता। अघटघटना-सुघट सुघट-विघटन विकट, भूमि-पाताल-जल-गगन-गंता॥ ८॥ जयति विश्व-विख्यात बानैत-विरुदावली, विदुष बरनत वेद विमल बानी। दास तुलसी त्रास शमन सीतारमण संग शोभित राम-राजधानी॥ ९॥

इस भजन के बारे में

यह स्तुति गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'विनय पत्रिका' का एक अत्यंत प्रभावशाली अंश है। इसमें हनुमान जी के अद्भुत पराक्रम, उनके रुद्र अवतार होने और प्रभु श्री राम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति का गुणगान किया गया है। इस स्तुति में हनुमान जी को अंजनी-पुत्र, संकटमोचन और बुद्धि के सागर के रूप में संबोधित किया गया है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि कैसे हनुमान जी ने लंका दहन, समुद्र लंघन और रावण के अहंकार को नष्ट कर प्रभु राम के कार्य को सिद्ध किया। इसका भावार्थ यह है कि जो भक्त हनुमान जी की शरण में जाता है, उसके सभी सांसारिक शोक और भय मिट जाते हैं। भक्त इसे विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की कृपा पाने के लिए गाते हैं। इस स्तुति का पाठ करने से मन में साहस, बल और बुद्धि का संचार होता है। जब भी जीवन में कोई कठिन परिस्थिति हो या मन में अशांति हो, तब इस स्तुति का गायन करने से हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और भक्त को प्रभु श्री राम के चरणों में स्थान मिलता है। यह स्तुति हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और सेवा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

Related Bhajans