Hanuman Ji

Hanumat Stuti (Jayati Mangalagaar)

श्री हनुमत स्तुति — जयति मंगलागार (विनय पत्रिका)

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Hanumat Stuti (Jayati Mangalagaar)
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जयति मंगलागार, संसार भारापहर, वानराकारविग्रह पुरारी। राम-रोषानल-ज्वाल्माला-मिष ध्वांतचर-सलभ-संहारकारी॥ १॥ जयति मरुदंजनामोद-मंदिर, नतग्रीव सुग्रीव-दु:खैकबंधो। यातुधानोधत-क्रुद्ध-कालाग्निहर, सिद्ध-सुर-सज्जनानंद-सिंधो॥ २॥ जयति रुद्राग्रणी, विश्व-वंद्याग्रणी, विश्वविख्यात-भट-चक्रवर्ती। सामगाताग्रणी, कामजेताग्रणी, रामहित, रामभक्तानुवर्ती॥ ३॥ जयति संग्रामजय, रामसंदेहसर, कौशला-कुशल-कल्याणभाषी। राम-विरहार्क-संतप्त-भरतादि-नरनारी-शीतलकरन कल्पशाषी॥ ४॥ जयति सिंघसनासीन सीतारमण, निरखि, निर्भरहरष नृत्यकारी। राम संभ्राज शोभा-सहित सर्वदा तुलसीमानस-रामपुर-विहारी॥ ५॥

इस भजन के बारे में

यह स्तुति गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'विनय पत्रिका' का एक अत्यंत दिव्य अंश है, जिसमें उन्होंने पवनपुत्र हनुमान जी की महिमा का गुणगान किया है। इस भजन में हनुमान जी को 'मंगलागार' यानी मंगल का भंडार कहा गया है। तुलसीदास जी बताते हैं कि हनुमान जी भगवान शिव के अंश हैं और वे प्रभु श्री राम के परम भक्त हैं। वे संसार के दुखों को हरने वाले और राक्षसों का संहार करने वाले हैं। इस स्तुति का भाव यह है कि हनुमान जी अपने भक्तों के कष्टों को उसी प्रकार मिटा देते हैं जैसे सूर्य अंधकार को नष्ट कर देता है।

भक्त इस स्तुति को विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार के दिन गाते हैं। इसे गाने का मुख्य उद्देश्य मन की शांति, साहस और प्रभु श्री राम की भक्ति प्राप्त करना है। जब भक्त जीवन में किसी कठिन परिस्थिति या भय का अनुभव करते हैं, तब इस स्तुति का पाठ उन्हें मानसिक बल और सुरक्षा का अनुभव कराता है। यह भजन हनुमान जी के उस स्वरूप को दर्शाता है जो सदैव राम-काज में लीन रहते हैं और अपने भक्तों को शीतलता प्रदान करते हैं। इसे श्रद्धापूर्वक गाने से हनुमान जी की कृपा और आशीर्वाद सहज ही प्राप्त होता है।

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