Kannappa Nayanar

कण्णप्पा नयनार

Kannappa Nayanar

अब तक हमने देवताओं, ऋषियों और राजाओं की कथाएँ सुनीं। यह कथा उनसे भिन्न है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कथा है जिसे न वेद आते थे, न मंत्र। जो शास्त्रों की विधि नहीं जानता था। जो जाति से भील (वनवासी शिकारी) था और जिसे मंदिर की परंपरा में अपवित्र माना जाता था। और फिर भी, दक्षिण भारत की परंपरा में उसे 63 नयनारों (शिव के परम भक्त संतों) में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उसका नाम था — कण्णप्पा।

आंध्र प्रदेश के श्रीकालहस्ती के निकट उडुप्पूर नामक एक वनवासी बस्ती थी। वहाँ के मुखिया नागन और उनकी पत्नी तत्तै निःसंतान थे। उन्होंने संतान के लिए मुरुगन (कार्तिकेय) की आराधना की और उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ। बालक इतना हृष्ट-पुष्ट और बलिष्ठ था कि उसका नाम रखा गया — तिण्णन, जिसका अर्थ है दृढ़ और बलवान। तिण्णन वन में ही पला-बढ़ा। धनुष-बाण चलाना, पशुओं के पदचिह्न पहचानना और शिकार करना ही उसका जीवन था। समय आने पर वह अपनी जनजाति का मुखिया बना। उसे न कोई मंत्र आता था, न कोई पूजा-विधि। उसने कभी शास्त्र सुने ही न थे।

एक दिन तिण्णन अपने साथियों के साथ शिकार पर निकला। एक सूअर का पीछा करते-करते वह बहुत दूर निकल गया और कालहस्ती पर्वत पर जा पहुँचा। वहाँ स्वर्णमुखी नदी के किनारे एक शिवलिंग स्थापित था। तिण्णन ने उस शिवलिंग को देखा और उसी क्षण कुछ ऐसा हुआ जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। उसके भीतर एक विचित्र भाव उमड़ा। उसने अपने साथी से पूछा कि यह क्या है। साथी ने कहा कि यह देवता हैं और ब्राह्मण इनकी पूजा करते हैं। तिण्णन की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा कि यह अकेले हैं, इस निर्जन वन में इनकी देखभाल कौन करता है, इन्हें भूख नहीं लगती होगी, कोई इन्हें भोजन नहीं देता। दक्षिण भारत की परंपरा में मान्यता है कि तिण्णन पूर्वजन्म में अर्जुन थे, इसीलिए शिवलिंग देखते ही उनके पूर्व-संस्कार जाग उठे।

तिण्णन को कोई विधि नहीं आती थी। इसलिए उसने वही किया जो उसे आता था। उसने सोचा कि भगवान भूखे होंगे। वह वन में गया, एक सूअर का शिकार किया, उसका मांस भूना और स्वयं चखकर देखा कि कहीं कड़वा या कच्चा तो नहीं। जो सबसे उत्तम भाग था, वही उसने पत्ते पर रखकर शिवलिंग के सामने अर्पित किया। फिर उसने सोचा कि भगवान को जल भी चाहिए। उसके पास कोई पात्र नहीं था, तो उसने अपने मुख में जल भरा और उसी से शिवलिंग का अभिषेक किया। फिर उसने अपने बालों में लगे जंगली फूल शिवलिंग पर चढ़ा दिए और रात भर धनुष लेकर वहीं पहरा देता रहा कि कहीं कोई जंगली जानवर भगवान को हानि न पहुँचाए।

शास्त्र की दृष्टि से तिण्णन ने हर नियम तोड़ा। मांस अर्पित किया, जूठा भोजन चढ़ाया, मुख के जल से अभिषेक किया और बालों के फूल चढ़ाए। वह चप्पल पहने हुए भीतर आया। एक भी विधि उसने ठीक से नहीं की, परन्तु उसकी हर क्रिया के पीछे एक ही भाव था कि मेरा भगवान भूखा न रहे, प्यासा न रहे और अकेला न रहे।

उसी शिवलिंग की पूजा एक ब्राह्मण शिवगोचरियार भी करते थे। वे प्रतिदिन आते, शुद्ध जल से अभिषेक करते, बिल्वपत्र चढ़ाते और मंत्रोच्चार करते। एक दिन जब वे आए, तो उन्होंने देखा कि शिवलिंग पर मांस के टुकड़े पड़े हैं और सब कुछ अस्त-व्यस्त है। वे क्रोधित होकर बोले कि कौन दुष्ट यह अपवित्रता कर गया। उन्होंने सब कुछ साफ किया और पुनः विधिवत पूजा की, परन्तु अगले दिन फिर वही दृश्य था।

व्यथित होकर शिवगोचरियार ने भगवान से प्रार्थना की कि कोई अपवित्र व्यक्ति प्रतिदिन आपका अपमान कर रहा है। उस रात शिव जी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि जिसे तुम अपवित्र कह रहे हो, वह मेरा परम भक्त है। तुम विधि से मेरी पूजा करते हो, वह प्रेम से करता है। तुम जो कुछ चढ़ाते हो, वह तुम्हारे पास बहुत है, वह जो चढ़ाता है, वही उसका सर्वस्व है। कल तुम छिपकर देखना, तब तुम्हें समझ आएगा कि उसकी भक्ति क्या है।

अगले दिन शिवगोचरियार वहीं छिप गए। तिण्णन आया और उसने देखा कि शिवलिंग की दाहिनी आँख से रक्त बह रहा है। तिण्णन का हृदय फट गया। उसने जड़ी-बूटियाँ लाकर आँख पर लगाईं, परन्तु रक्त बहना बंद नहीं हुआ। तब उसने बिना एक क्षण हिचके अपना बाण निकाला, अपनी दाहिनी आँख निकाल ली और शिवलिंग की रक्त बहती आँख पर लगा दी। रक्त तत्काल रुक गया। तिण्णन आनंद से नाच उठा।

परन्तु अगले ही क्षण शिवलिंग की बायीं आँख से भी रक्त बहने लगा। तिण्णन ने अपने पैर का अंगूठा शिवलिंग की बायीं आँख पर रख दिया ताकि अंधा होने के बाद भी वह स्पर्श से जान सके कि आँख कहाँ लगानी है। और फिर उसने बाण उठाकर अपनी दूसरी आँख भी निकालनी आरंभ की। बाण उसकी आँख तक पहुँचता, उससे पहले ही शिवलिंग से एक हाथ प्रकट हुआ और उसने तिण्णन का हाथ पकड़ लिया। एक गंभीर वाणी गूँजी कि रुक जाओ कण्णप्पा।

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