Hanuman Ji

Nahi Pichhanyo Re Beera

नही पिछाण्यो रे बीरा

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ले मुद्रिका हनुमान जब आये सिया के पास। देख मुद्रिका सीता बोली मैं कैसे करूं विश्वास॥ दोहा नही पिछाण्यो रे बीरा थारो दुर्बल बहुत शरीर। ना थने देख्यो पुरी अयोध्या ना सरयु की तीरा। ना थने देख्यो संग राम के है कोई छलबीरा॥ टेक ॥ नही आयो में पुरी अयोध्या ना सरयु की तीरा। बन में हुआ राम का सेवक में अंजनी सुत वीरा॥1॥ सौ योजन मर्यादा सिंधु की किस विध उतरियो तीरा। लंका में दो राक्षस कहीज्ये विकट बहुत शरीरा॥2॥ प्रभु प्रताप से लंका कुदयो उतरियो सागर तीरा। भक्त विभीषण पत्तो बतायो आयो हनुमत बीरा॥3॥ अब तुम धीर धरो मेरी जननी आवत है रघुवीरा। राक्षस मारकर थांने ले जावे संग में लक्ष्मण वीरा॥4॥ दुष्ट संहारे भक्त उबारे रूप धरे महावीरा। तुलसीदास आशा रघुवर की हरे जनन की पीरा॥5॥

✍️ रचयिता: तुलसीदास

इस भजन के बारे में

यह भजन प्रभु श्री राम के परम भक्त हनुमान जी और माता सीता के बीच हुए संवाद पर आधारित है। जब हनुमान जी लंका में माता सीता को श्री राम की मुद्रिका (अंगूठी) दिखाते हैं, तो माता सीता को संशय होता है कि क्या वे वास्तव में राम जी के दूत हैं। इस भजन में हनुमान जी अपनी विनम्रता और भक्ति का परिचय देते हुए माता को विश्वास दिलाते हैं कि वे प्रभु की सेवा में आए हैं। यह रचना हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता और भक्त हमेशा अपने प्रभु के प्रताप का ही गुणगान करता है।

यह भजन मुख्य रूप से हनुमान जी की शक्ति और उनकी अटूट निष्ठा को समर्पित है। भक्त इसे विशेष रूप से मंगलवार, शनिवार या हनुमान जयंती के अवसर पर गाते हैं। इसे गाने से मन में व्याप्त भय और संशय दूर होते हैं और प्रभु श्री राम व हनुमान जी के प्रति विश्वास गहरा होता है। यह भजन संकट के समय धैर्य रखने और प्रभु की कृपा पर अटूट भरोसा रखने की प्रेरणा देता है, जिससे भक्तों के जीवन के कष्ट दूर होते हैं और उन्हें मानसिक शांति प्राप्त होती है।

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