Aarti Shri Kunjbihari Ji Ki
आरती श्री कुंजबिहारी जी की
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✍️ रचयिता: स्वामी हरिदास
इस भजन के बारे में
यह आरती भगवान श्री कृष्ण के 'कुंजबिहारी' स्वरूप को समर्पित है, जो ब्रज की गलियों में अपनी लीलाएं रचाते हैं। इस भजन का भावार्थ प्रभु के उस मनमोहक रूप का वर्णन करना है, जिसमें वे गले में वैजयंती माला पहने, मुरली बजाते हुए और मोर मुकुट धारण किए हुए अत्यंत सुंदर लगते हैं। यह आरती हमें याद दिलाती है कि प्रभु का रूप इतना दिव्य है कि देवता भी उनके दर्शन के लिए तरसते हैं। यह भगवान की करुणा और उनके भक्त-वत्सल स्वभाव को दर्शाती है, जो अपने भक्तों की पुकार सुनकर उनके दुखों को हर लेते हैं।
भक्त इस आरती को मुख्य रूप से श्री कृष्ण जन्माष्टमी, एकादशी या किसी भी शुभ अवसर पर गाते हैं। इसे गाने का उद्देश्य मन को शांत करना और प्रभु के प्रति प्रेम और भक्ति भाव को जगाना है। जब भक्त पूरी श्रद्धा के साथ यह आरती गाते हैं, तो उन्हें मानसिक शांति और प्रभु की कृपा का अनुभव होता है। यह आरती हमें सिखाती है कि संसार के सभी कष्टों को मिटाने का एकमात्र उपाय प्रभु का स्मरण और उनके चरणों में पूर्ण समर्पण है। इसे गाने से हृदय में भक्ति का संचार होता है और मन में आनंद की अनुभूति होती है।
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