Kashi Vishwanath and Manikarnika Ghat

काशी विश्वनाथ और मणिकर्णिका घाट की महिमा

Kashi Vishwanath and Manikarnika Ghat

काशी को संसार की सबसे प्राचीन जीवित नगरी माना जाता है। इसके तीन नाम हैं और तीनों का अपना अर्थ है। काशी का अर्थ है 'काश्' धातु से, अर्थात् जो प्रकाशित हो। वह नगरी जहाँ ज्ञान का प्रकाश है। वाराणसी का अर्थ है वरुणा और असी, इन दो नदियों के बीच बसी होने के कारण। अविमुक्त क्षेत्र का अर्थ है क्योंकि भगवान शिव ने कहा कि वे इस स्थान को कभी नहीं छोड़ेंगे।

पौराणिक कथा के अनुसार, विवाह के पश्चात् माता पार्वती को कैलाश का शीत और एकांत अच्छा नहीं लगा। उन्होंने शिव जी से कहा कि उन्हें भी अपना एक घर चाहिए। तब शिव जी ने पृथ्वी पर काशी को चुना। मान्यता है कि काशी शिव के त्रिशूल की नोक पर टिकी है। प्रलय के समय जब समस्त सृष्टि जल में डूब जाती है, तब भी काशी नष्ट नहीं होती। शिव जी उसे अपने त्रिशूल पर उठाकर सुरक्षित रखते हैं।

काशी से जुड़ी एक अत्यंत रोचक कथा राजा दिवोदास की है। एक समय काशी पर दिवोदास नामक एक अत्यंत धर्मपरायण राजा का शासन था। उसने ब्रह्मा जी से वरदान पाकर यह शर्त रखी थी कि उसके शासन काल में कोई देवता नगर में नहीं रहेगा। इस कारण शिव जी को भी काशी छोड़कर मंदराचल पर्वत पर जाना पड़ा। परन्तु शिव जी का मन काशी में ही लगा रहता था। उन्होंने नगर वापस पाने के लिए अपने गणों, सूर्यदेव, ब्रह्मा जी और गणेश जी को भेजा, परन्तु वे सभी वहीं रम गए। अंततः शिव जी ने भगवान विष्णु को भेजा। विष्णु जी ने बुद्धिमानी से कार्य किया और राजा को मोक्ष की ओर प्रेरित किया। राजा दिवोदास ने सहर्ष नगर शिव जी को सौंप दिया। तभी से शिव जी विश्वनाथ के रूप में काशी में विराजमान हैं।

काशी की एक और विशेषता है यहाँ के रक्षक काल भैरव, जिन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। मान्यता है कि काशी में कोई भी व्यक्ति बिना काल भैरव की अनुमति के न प्रवेश कर सकता है, न मृत्यु को प्राप्त हो सकता है। काशी की सबसे बड़ी महिमा यही है कि इसे मोक्षपुरी माना जाता है। मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति काशी में प्राण त्यागता है, तब स्वयं भगवान शिव उसके कान में तारक मंत्र देते हैं।

काशी में 88 से अधिक घाट हैं, परन्तु मणिकर्णिका सबसे विशेष है। यह वह स्थान है जहाँ चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती। यहाँ के नाम और उत्पत्ति की तीन प्रमुख कथाएँ हैं। पहली कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने यहाँ तपस्या की और अपने सुदर्शन चक्र से एक कुंड खोदा। शिव जी उनके तप से इतने आनंदित हुए कि उनके कान का कुंडल उस कुंड में गिर पड़ा। मणि और कर्णिका के मिलन से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा।

दूसरी कथा के अनुसार, विष्णु जी के तप से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें वरदान दिया कि वे काशी को कभी न छोड़ें और जो भी प्राणी यहाँ प्राण त्यागे, उसे मुक्ति मिले। तीसरी कथा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की है। विश्वामित्र की परीक्षा के कारण हरिश्चंद्र को मणिकर्णिका घाट पर श्मशान की रखवाली करनी पड़ी। उन्होंने अपने धर्म का पालन करते हुए अपनी पत्नी तारामती से भी शुल्क माँगा, जब वह अपने मृत पुत्र रोहिताश्व का संस्कार करने आई थी। हरिश्चंद्र के इस अटूट सत्य और धर्म पालन को देखकर देवता प्रकट हुए और उनकी परीक्षा समाप्त हुई।

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