अर्जुन और किरात — पाशुपतास्त्र की प्राप्ति
Arjuna and the Kirata — How Shiva Granted the Pashupatastra
१. पृष्ठभूमि — वनवास का समय
द्यूत सभा में सब कुछ हार जाने के बाद पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला।
वन में रहते हुए युधिष्ठिर के मन में एक चिंता थी —
"तेरह वर्ष बाद जब युद्ध होगा, तब सामने भीष्म, द्रोण, कर्ण और कौरवों की विशाल सेना होगी। हमारे पास न सेना है, न दिव्यास्त्र। हम कैसे जीतेंगे?"
२. व्यास जी का परामर्श
उसी समय महर्षि व्यास वहाँ पधारे।
उन्होंने कहा —
"चिंता मत करो। इसका उपाय है। अर्जुन को तपस्या के लिए भेजो। वह इंद्रकील पर्वत पर जाकर भगवान शिव की आराधना करे और उनसे पाशुपतास्त्र प्राप्त करे।
यह अस्त्र संसार का सर्वश्रेष्ठ अस्त्र है। जिसके पास यह है, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता।"
व्यास जी ने अर्जुन को प्रतिस्मृति विद्या भी सिखाई, जिससे वह किसी भी देवता का स्मरण कर सके।
३. अर्जुन का प्रस्थान
अर्जुन ने भाइयों और द्रौपदी से विदा ली।
द्रौपदी ने कहा — "आप ही हमारी आशा हैं।" युधिष्ठिर ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
अर्जुन हिमालय की ओर चल पड़े और इंद्रकील पर्वत पर पहुँचे।
४. घोर तपस्या
अर्जुन ने वहाँ अत्यंत कठोर तप आरंभ किया।
पहले महीने में वे तीन दिन में एक बार फल खाते।
दूसरे महीने में छह दिन में एक बार।
तीसरे महीने में पंद्रह दिन में एक बार।
चौथे महीने से उन्होंने आहार पूर्णतः त्याग दिया और केवल वायु पर रहने लगे।
वे दोनों हाथ ऊपर उठाकर, एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर, "ॐ नमः शिवाय" का जप करते रहे।
उनका तेज इतना बढ़ गया कि आसपास के ऋषि व्याकुल हो उठे और उन्होंने शिव जी से प्रार्थना की — "यह कौन है जिसका तप इतना प्रचंड है? इसे रोकिए।"
शिव जी ने मुस्कुराकर कहा — "चिंता मत करो, यह अर्जुन है। मैं स्वयं जाकर देखता हूँ।"
५. मूक दैत्य का आगमन
उसी समय दुर्योधन द्वारा भेजा गया मूक नामक एक दैत्य वहाँ पहुँचा।
उसने विशाल सूअर का रूप धारण किया और अर्जुन पर आक्रमण करने के लिए दौड़ा।
अर्जुन ने तप भंग करके तत्काल गांडीव उठाया और बाण चढ़ाया।
६. एक साथ दो बाण
ठीक उसी क्षण एक और बाण उस सूअर पर आकर लगा।
अर्जुन ने देखा — सामने एक किरात (वनवासी शिकारी) खड़ा था, हृष्ट-पुष्ट, तेजस्वी, हाथ में धनुष लिए। उसके साथ एक किरात स्त्री और शिकारी दल भी था।
(वह किरात स्वयं भगवान शिव थे और वह स्त्री माता पार्वती। परन्तु अर्जुन उन्हें पहचान न सके।)
सूअर वहीं गिरकर मर गया।
७. विवाद
किरात ने कहा — "यह मेरा शिकार है। मैंने पहले बाण मारा।"
अर्जुन ने कहा — "नहीं, यह मेरा है। मैंने पहले प्रहार किया।"
किरात हँसा और बोला —
"तुम कौन हो? इस वन में तुम्हारा क्या काम? यह हमारा क्षेत्र है, और यह शिकार हमारा है।"
अर्जुन का क्षत्रिय स्वाभिमान जागा।
उन्होंने कहा — "मैं इंद्रपुत्र अर्जुन हूँ। यदि तुम्हें अपने बल का अभिमान है, तो युद्ध कर लो।"
८. युद्ध
घोर युद्ध आरंभ हुआ।
अर्जुन ने गांडीव से बाणों की वर्षा आरंभ की। परन्तु आश्चर्य — उनके सारे बाण उस किरात तक पहुँचकर व्यर्थ हो जाते, कोई प्रभाव ही न होता।
अर्जुन का तूणीर (तरकश), जो अक्षय था और कभी खाली नहीं होता था — वह भी खाली हो गया।
अर्जुन स्तब्ध रह गए। जीवन में पहली बार ऐसा हुआ था।
९. धनुष से युद्ध
अब अर्जुन ने गांडीव को ही उठाकर किरात के सिर पर प्रहार किया।
किरात ने उसे भी छीन लिया।
फिर अर्जुन ने तलवार से आक्रमण किया — वह किरात के शरीर से टकराकर टूट गई।
फिर उन्होंने वृक्ष और शिलाएँ उठाकर फेंकीं — वे भी व्यर्थ गईं।
१०. मल्लयुद्ध
अंततः अर्जुन ने मल्लयुद्ध (कुश्ती) आरंभ किया।
वे किरात से भिड़ गए। परन्तु किरात ने उन्हें ऐसा कसकर पकड़ा कि अर्जुन की साँस रुकने लगी।
अर्जुन का समस्त बल क्षीण हो गया और वे मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
११. पार्थिव लिंग की पूजा
कुछ समय बाद अर्जुन को होश आया।
वे टूटे हुए, पराजित, और अत्यंत व्यथित थे। जीवन में पहली बार उन्हें अपने बल की सीमा दिखी थी।
उन्होंने सोचा — "मेरा बल व्यर्थ है। अब मुझे केवल महादेव की शरण चाहिए।"
उन्होंने वहीं मिट्टी का एक पार्थिव शिवलिंग बनाया और उस पर फूलों की माला चढ़ाकर प्रार्थना आरंभ की।
१२. वह चमत्कार
और तभी वह हुआ जिससे सब कुछ स्पष्ट हो गया।
अर्जुन ने देखा कि जो माला उन्होंने शिवलिंग पर चढ़ाई थी, वह किरात के गले में शोभा पा रही है।
अर्जुन काँप उठे।
उन्होंने ऊपर देखा — और उन्हें सब समझ आ गया।
"यह किरात कोई साधारण मनुष्य नहीं — ये स्वयं महादेव हैं!"
वे तत्काल चरणों में गिर पड़े।
१३. क्षमा-याचना
अर्जुन रोते हुए बोले —
"प्रभु, मुझे क्षमा कीजिए। मैं मूर्ख था। जिनकी आराधना करने आया था, उन्हीं से युद्ध कर बैठा।
मेरे अहंकार ने मुझे अंधा कर दिया था। मैं आपको पहचान न सका।"
१४. शिव का प्रकट होना
उसी क्षण किरात का वेश विलीन हुआ और सामने भगवान शिव माता पार्वती के साथ अपने दिव्य स्वरूप में खड़े थे।
शिव जी ने मुस्कुराकर कहा —
"अर्जुन, उठो। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।
तुमने क्षमा माँगी, परन्तु तुमने कोई अपराध नहीं किया। मैं तुम्हें दंड देने नहीं, परखने आया था।
मैं देखना चाहता था कि तुम्हारे भीतर केवल बल है या साहस भी। तुमने जानते हुए भी कि सामने वाला अजेय है, हार नहीं मानी। यही वीरता है।
और अंत में जब तुमने बल की सीमा देखी, तो तुमने समर्पण किया। यही ज्ञान है।
जो केवल लड़ना जानता है, वह योद्धा है। जो लड़ना और झुकना — दोनों जानता है, वही महान योद्धा है।"
१५. पाशुपतास्त्र का दान
फिर शिव जी ने कहा —
"तुम्हें अपने पूर्वजन्म का स्मरण नहीं। तुम पूर्वजन्म में नर ऋषि थे, और तुम्हारे साथी नारायण। तुम साधारण नहीं हो।
अब मैं तुम्हें वह अस्त्र देता हूँ जिसके लिए तुम आए थे — पाशुपतास्त्र।"
१६. पाशुपतास्त्र की भयंकरता
शिव जी ने उन्हें उस अस्त्र का मंत्र, प्रयोग और संहार-विधि सिखाई।
और साथ में एक कठोर चेतावनी दी —
"अर्जुन, यह अस्त्र सामान्य नहीं है। यह समस्त सृष्टि को क्षण भर में भस्म कर सकता है।
इसका प्रयोग किसी साधारण योद्धा पर मत करना। यदि कम शक्ति वाले पर चलाओगे, तो यह सम्पूर्ण जगत का नाश कर देगा।
इसका प्रयोग तभी करना जब कोई और उपाय शेष न रहे।"
अर्जुन ने वचन दिया।
(और यह उल्लेखनीय है कि महाभारत युद्ध में अर्जुन ने इसका प्रयोग कभी नहीं किया — अंत तक नहीं। यही उनके संयम का प्रमाण है।)
१७. अन्य देवताओं से अस्त्र-प्राप्ति
शिव जी के प्रसन्न होने के बाद अन्य देवता भी प्रकट हुए और उन्होंने अर्जुन को अपने-अपने अस्त्र प्रदान किए —
वरुण ने पाश
यम ने दंड
कुबेर ने अंतर्धान अस्त्र
इंद्र ने वज्र और अपने लोक में आमंत्रण
अर्जुन इसके बाद कुछ समय इंद्रलोक में रहे, जहाँ उन्होंने गंधर्व चित्रसेन से संगीत और नृत्य सीखा — जो आगे चलकर अज्ञातवास में बृहन्नला के रूप में काम आया।
१८. किरातार्जुनीयम्
इस प्रसंग पर संस्कृत के महाकवि भारवि ने एक सम्पूर्ण महाकाव्य लिखा है — "किरातार्जुनीयम्"।
यह संस्कृत के पाँच महाकाव्यों में गिना जाता है और अपनी भाषा-चातुरी तथा ओज के लिए प्रसिद्ध है।
इसकी एक विशेष रचना है "चित्र काव्य" — जिसमें एक श्लोक ऐसा है जो केवल एक ही व्यंजन ("न") से बना है, और फिर भी उसका पूर्ण अर्थ निकलता है। यह संस्कृत साहित्य का एक आश्चर्य माना जाता है।
१९. पशुपतिनाथ से संबंध
पाशुपत नाम शिव के पशुपति स्वरूप से आया है — अर्थात् "पशुओं (जीवों) के स्वामी"।
दर्शन में इसका अर्थ गहरा है — यहाँ "पशु" का अर्थ पशु नहीं, बल्कि बंधन में बँधा हुआ जीव है। और "पाश" का अर्थ है बंधन — मोह, अहंकार, कर्म।
पशुपति वे हैं जो इन बंधनों से मुक्त कराते हैं।
इसलिए पाशुपतास्त्र का गूढ़ अर्थ केवल संहारक अस्त्र नहीं — यह वह शक्ति है जो बंधनों को काट देती है।
२०. कथा का सार
पहला संदेश — अहंकार पहचानने नहीं देता। अर्जुन जिनकी आराधना कर रहे थे, वे सामने खड़े थे — और वे पहचान न सके। जब तक "मैं" बीच में है, ईश्वर सामने होकर भी दिखाई नहीं देता।
दूसरा संदेश — हार भी वरदान बन सकती है। अर्जुन का गांडीव व्यर्थ गया, अक्षय तूणीर खाली हो गया, और वे मूर्च्छित हो गए। और उसी पराजय ने उन्हें वह दिया जो विजय कभी न दे पाती।
तीसरा संदेश — परीक्षा दंड नहीं होती। शिव जी अर्जुन को हराने नहीं, परखने आए थे। जीवन की कठिनाइयाँ भी प्रायः दंड नहीं, परीक्षा होती हैं।
चौथा संदेश — हार न मानना। अर्जुन बार-बार गिरे, पर हर बार उठे — बाण गए तो धनुष, धनुष गया तो तलवार, तलवार गई तो हाथ। साहस का अर्थ जीतना नहीं, टूटकर भी खड़े रहना है।
पाँचवाँ संदेश — शक्ति के साथ संयम। अर्जुन को सबसे भयंकर अस्त्र मिला, और उन्होंने पूरे महाभारत में उसका एक बार भी प्रयोग नहीं किया। वास्तविक शक्ति अस्त्र पाने में नहीं, उसे न चलाने के संयम में है।
२१. एक विनम्र निवेदन
यह प्रसंग मुख्यतः महाभारत के वन पर्व में "कैरात पर्व" के रूप में आता है। शिव पुराण और स्कंद पुराण में भी इसके संदर्भ मिलते हैं।
भारवि के किरातार्जुनीयम् में यही कथा काव्य रूप में विस्तार से आती है, कुछ भिन्नताओं के साथ।
पाशुपतास्त्र के प्रयोग को लेकर भी विभिन्न पाठ हैं — कुछ में इसका उल्लेख अन्य प्रसंगों में भी मिलता है।
किसी एक पाठ को अंतिम मान लेना उचित नहीं। मर्म सर्वत्र एक ही है — जो अपने बल के आगे झुकना सीख जाए, उसे वह मिल जाता है जो बल से कभी नहीं मिलता।