chetavni bhajan

Ud Javalo Panchhido Thari Kaya Ko

उड़ जावलो पंछीड़ो थारी काया को

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साधू की संगती रहो, जौ की भूसी खाऊँ, खीर खांड भोजन मिले, साकती संग ना जाऊँ। कबीर कहते क्यों बनें, अनमिलता को संग, दीपक को भावे नहीं, जरि जरि मरे पतंग। उड़ जावलो पंछीड़ो थारी काया को मतना गुमान कर माया को ॥ टेक ॥ नो दस मास गर्भ म झूल्यो बाहर आर हरि न भूल्यो सर कर्ज चढ़ा लियो माया को ॥1॥ बचपन बीत जवानी आई नार नवेली तन परणाई सुख भोग रयो सहज काया को ॥2॥ या माया थारी संग नहीं जावे जोड़ जोड़ कर तू मर जावे नीतकी कर रयो काम बुराया को ॥3॥ रामप्रसाद हरि का गुण गाले जीवन नया पार लगाले ध्यान धर ल र गुरु साया क