Krishna

Ud Javalo Panchhido Thari Kaya Ko

उड़ जावलो पंछीड़ो थारी काया को

👁 5 views
Ud Javalo Panchhido Thari Kaya Ko
Text size:
साधू की संगती रहो, जौ की भूसी खाऊँ, खीर खांड भोजन मिले, साकती संग ना जाऊँ। दोहा कबीर कहते क्यों बनें, अनमिलता को संग, दीपक को भावे नहीं, जरि जरि मरे पतंग। दोहा उड़ जावलो पंछीड़ो थारी काया को मतना गुमान कर माया को ॥ टेक ॥ नो दस मास गर्भ म झूल्यो बाहर आर हरि न भूल्यो सर कर्ज चढ़ा लियो माया को ॥1॥ बचपन बीत जवानी आई नार नवेली तन परणाई सुख भोग रयो सहज काया को ॥2॥ या माया थारी संग नहीं जावे जोड़ जोड़ कर तू मर जावे नीतकी कर रयो काम बुराया को ॥3॥ रामप्रसाद हरि का गुण गाले जीवन नया पार लगाले ध्यान धर ल र गुरु साया को ॥4॥

इस भजन के बारे में

यह भजन संत रामप्रसाद जी द्वारा रचित है, जिसमें 'पंछीड़ो' के रूप में जीवात्मा को संबोधित किया गया है। इसका भावार्थ यह है कि यह शरीर नश्वर है और मनुष्य को माया के अहंकार में नहीं पड़ना चाहिए। भजन हमें याद दिलाता है कि हम खाली हाथ आए थे और अंत में सब कुछ यहीं छूट जाएगा, इसलिए व्यर्थ के मोह और बुरे कर्मों को छोड़कर प्रभु की भक्ति में मन लगाना ही जीवन की सार्थकता है।

भक्त इस भजन को वैराग्य और आत्म-चिंतन के समय गाते हैं। यह हमें जीवन की क्षणभंगुरता का बोध कराता है और गुरु की शरण में जाकर हरि नाम का स्मरण करने की प्रेरणा देता है। जब मन सांसारिक उलझनों में भटकने लगे, तब इस भजन का गायन मन को शांति और सही दिशा प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि माया के जाल से ऊपर उठकर आत्मा का कल्याण करना ही मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए।

Related Bhajans