Ud Javalo Panchhido Thari Kaya Ko
उड़ जावलो पंछीड़ो थारी काया को
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इस भजन के बारे में
यह भजन संत रामप्रसाद जी द्वारा रचित है, जिसमें 'पंछीड़ो' के रूप में जीवात्मा को संबोधित किया गया है। इसका भावार्थ यह है कि यह शरीर नश्वर है और मनुष्य को माया के अहंकार में नहीं पड़ना चाहिए। भजन हमें याद दिलाता है कि हम खाली हाथ आए थे और अंत में सब कुछ यहीं छूट जाएगा, इसलिए व्यर्थ के मोह और बुरे कर्मों को छोड़कर प्रभु की भक्ति में मन लगाना ही जीवन की सार्थकता है।
भक्त इस भजन को वैराग्य और आत्म-चिंतन के समय गाते हैं। यह हमें जीवन की क्षणभंगुरता का बोध कराता है और गुरु की शरण में जाकर हरि नाम का स्मरण करने की प्रेरणा देता है। जब मन सांसारिक उलझनों में भटकने लगे, तब इस भजन का गायन मन को शांति और सही दिशा प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि माया के जाल से ऊपर उठकर आत्मा का कल्याण करना ही मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए।
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