Shiv

Shankar Jatadhari, Parvatan Laage Pyari

शंकर जटाधारी, पार्वतां लागे प्यारी।

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शंकर जटाधारी, पार्वतां लागे प्यारी। डम डमाडम डमरु बाजे, शंकर जटाधारी ।। कांही जीमे कानजी रे, कांही राधा रानी। कांही जीमे भोळो बाबो, शंकर जटाधारी ।। शंकर जटाधारी, पार्वतां लागे प्यारी। डम डमाडम डमरु बाजे, शंकर जटाधारी ।। माखण जीमे कानजी रे, मिसरी राधा रानी। भांग अरोगे म्हारो, शंकर जटाधारी ।। शंकर जटाधारी, पार्वतां लागे प्यारी। डम डमाडम डमरु बाजे, शंकर जटाधारी ।। कठे रेहवे कानजी रे, कठे राधा रानी। कठे रेहवे ओ म्हारो, शंकर जटाधारी ।। शंकर जटाधारी, पार्वतां लागे प्यारी। डम डमाडम डमरु बाजे, शंकर जटाधारी ।। गोकुल रेहवे कानजी रे, वन में राधा रानी। पहाड़ां मांही रेहवे बाबो, शंकर जटाधारी ।। शंकर जटाधारी, पार्वतां लागे प्यारी। डम डमाडम डमरु बाजे, शंकर जटाधारी ।। बागो पेहरे कानजी रे, साड़ी राधा रानी। बाघम्बर पेहरे म्हारो, शंकर जटाधारी ।। शंकर जटाधारी, पार्वतां लागे प्यारी। डम डमाडम डमरु बाजे, शंकर जटाधारी ।।

इस भजन के बारे में

यह सुंदर भजन भगवान शिव के जटाधारी स्वरूप और माता पार्वती के प्रति उनके प्रेम को समर्पित है। इस भजन में बहुत ही सरल और मधुर शब्दों में भगवान शिव की तुलना भगवान कृष्ण और राधा रानी से की गई है। जहाँ कृष्ण माखन और राधा रानी मिश्री का भोग लगाती हैं, वहीं हमारे भोले बाबा भांग का आनंद लेते हैं। यह भजन हमें बताता है कि भगवान शिव का जीवन कितना सरल और वैराग्यपूर्ण है, जो गोकुल या महलों में नहीं, बल्कि ऊँचे पहाड़ों और वनों में निवास करते हैं।

भक्त इस भजन को विशेष रूप से शिवरात्रि, सावन के सोमवार या शिव मंदिरों में होने वाले सत्संग के दौरान गाते हैं। इसे गाने का मुख्य उद्देश्य भगवान शिव की निराली महिमा का स्मरण करना और उनके प्रति अपनी भक्ति प्रकट करना है। इस भजन को सुनने और गाने से मन में शांति का अनुभव होता है और भक्त स्वयं को महादेव के चरणों में समर्पित महसूस करता है। यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर के अलग-अलग रूप और स्वभाव हो सकते हैं, लेकिन वे सभी भक्तों के प्रेम के भूखे हैं।

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