Ram

Chadariya Jhini Re Jhini (Anup Jalota)

चदरिया झीनी रे झीनी

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चदरिया झीनी रे झीनी, राम नाम रस भीनी॥ अष्ट कमल का चरखा बनाया, पाँच तत्व की पूनी। नौ दस मास बुनन को लागे, मूरख मैली कीनी॥ जब मोरी चादर बन घर आई, रंगरेज को दीनी। ऐसा रंग रँगा रँगरेज ने, लालो लाल कर दीनी॥ चादर ओढ़ शंका मत करियो, ये दो दिन तुमको दीनी। मूरख लोग भेद नहिं जाने, दिन दिन मैली कीनी॥ दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी॥

इस भजन के बारे में

संत कबीर दास जी द्वारा रचित यह भजन मानव जीवन की नश्वरता और उसकी पवित्रता का एक सुंदर प्रतीक है। यहाँ 'चदरिया' का अर्थ हमारा शरीर है, जिसे ईश्वर ने पाँच तत्वों से बड़ी कुशलता से बुना है। कबीर जी कहते हैं कि यह शरीर रूपी चादर हमें प्रभु के नाम के रंग में रंगने के लिए मिली है, लेकिन अज्ञानता के कारण हम इसे सांसारिक मोह-माया के दागों से मैला कर देते हैं। यह भजन हमें याद दिलाता है कि यह जीवन केवल कुछ दिनों की एक सुंदर भेंट है, जिसे हमें शुद्ध और निर्मल बनाए रखना चाहिए।

यह भजन मुख्य रूप से कबीर पंथी विचारधारा और निर्गुण भक्ति का आधार है। भक्त इसे अक्सर सत्संग, ध्यान या आत्म-चिंतन के समय गाते हैं। इसे सुनने से मन में वैराग्य और प्रभु के प्रति समर्पण का भाव जागृत होता है। कबीर जी का संदेश है कि जैसे उन्होंने इस चादर को ओढ़ा और अंत में प्रभु को ज्यों की त्यों लौटा दिया, वैसे ही हमें भी अपने जीवन को निष्कलंक और अहंकार से मुक्त रखकर ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए। यह भजन हमें जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानने की प्रेरणा देता है।

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